देश की पहली स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी अरिहंत ने किया बैलिस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण
नई दिल्ली। रूस-यूक्रेन युद्ध और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की लगातार बढ़ती आक्रामकता के बीच देश की पहली स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत ने शुक्रवार 14 अक्टूबर को बैलिस्टिक मिसाइल (एसएलबीएम) का सफल प्रक्षेपण किया है। रक्षा मंत्रालय ने बताया कि यह परीक्षण एक पूर्व निर्धारित रेंज में किया गया।
जिसमें इसने अत्यधिक उच्च सटीकता के साथ बंगाल की खाड़ी में अपने लक्ष्य पर निशाना लगाया।
इसके अलावा मिसाइल ने परीक्षण के दौरान हथियार प्रणाली से जुड़े सभी संक्रियात्मक और तकनीकी मापदंडों को भी पूरा किया।
यहां बता दें कि इससे पहले भारत द्वारा अरिहंत से पानी के अंदर कंटेनर के जरिए मिसाइल का परीक्षण किया गया था।
लेकिन बैलिस्टिक मिसाइल का ये पहला सफल परीक्षण है। इस समय भारत के पास दो परमाणु चालित पनडुब्बियां हैं। जिसमें से एक अरिहंत है और दूसरी रूस से लीज पर ली गई आईएनएस चक्र पनडुब्बी है।
इसके अलावा आगामी कुछ वर्षों में तीन और परमाणु चालित पनडुब्बियों के नौसेना के बेड़े में शामिल होने की संभावना है। अरिहंत देश को उन दुश्मनों से बचाता है जो भारत पर परमाणु हमला करने की क्षमता रखते हैं।
न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता
को लेकर प्रतिबद्ध भारत
मंत्रालय ने ये भी कहा कि यह परीक्षण भारत की विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध की क्षमता के अनुरूप है। जो कि इसकी पहले प्रयोग नहीं यानी नो फर्स्ट यूज की प्रतिबद्धता को भी रेखांकित करता है। देश की उक्त नीति एक मजबूत, सुरक्षित बचे रहने और सुनिश्चित जवाबी क्षमता पर केंद्रित है।
आईएनएस अरिहंत द्वारा एसएलबीएम का सफल उपयोगकर्ता परीक्षण प्रक्षेपण कर्मी दल की योग्यता साबित करने और एसएसबीएन कार्यक्रम को मान्य करने के लिए महत्वपूर्ण है। ये भारत की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का एक प्रमुख तत्व है।
जल, थल और नभ में वार
करने में सक्षम अरिहंत
गौरतलब है कि अरिहंत भारत की एकमात्र स्वदेशी और जल, थल और नभ में परमाणु हमला करने में सक्षम पनडुब्बी है। जिसे स्ट्रैजिक स्ट्राइक न्यूक्लियर सबमरीन (एसएसबीएन) भी कहा जाता है।
वर्ष 2009 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने इसे कारगिल युद्ध की 10वीं वर्षगांठ के मौके पर लांच किया था।
इसके बाद वर्ष 2013 में इसका परमाणु रिएक्टर सक्रिय किया गया और 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अरिहंत को नौसेना में आधिकारिक रूप से शामिल किया।
जिसके बाद भारत परमाणु क्षमता से लैस पनडुब्बी बनाने वाला दुनिया का छठा देश बन गया। उससे पहले अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और ब्रिटेन ने ही परमाणु पनडुब्बी का निर्माण किया था।
1967 में शुरूआत हुई थी अरिहंत पनडुब्बी निर्माण की

1974 में देश के पहले परमाणु परीक्षण के उपरांत पोकरन में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी
अरिहंत पनडुब्बी के बनने की शुरुआत वर्ष 1967 में हो चुकी थी। क्योंकि उसी साल नौसेना और बार्क ने परमाणु पनडुब्बी के निर्माण की योजना बनाई थी। जिसके बाद 1970 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस परियोजना पर काम करने के लिए कहा।
वर्ष 1974 में भारत द्वारा अपना पहला परमाणु टेस्ट करने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा इस पनडुब्बी निर्माण को आधिकारिक मंजूरी प्रदान की गई थी। जिसके बाद 1984 में इसके लिए डिजाइन और प्रौद्योगिकी को तैयार किया गया।
हालांकि इस पर काम 1998 में शुरू हुआ था। इसके बाद इसके निर्माण में विशाखापट्टनम के शिप बिल्डिंग सेंटर में बार्क, नौसेना और डीआरडीओ के वैज्ञानिकों को कुल 11 साल लग गए।
परंपरागत पनडुब्बी से बिल्कुल अलग
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जल, थल और नभ में हमला करने में सक्षम अरिहंत पनडुब्बी को न्यूक्लियर ट्रायड भी कहा जाता है। जिसका अर्थ होता है तीनों स्तर की सुरक्षा।
यह कुल करीब 6 हजार टन वजनी है और इसकी लंबाई 110 मीटर और चौड़ाई 11 मीटर है। अरिहंत में चालक दल की संख्या 95 से 100 के करीब है। यह परंपरागत पनडुब्बियों से काफी अलग है।
जिसमें समुद्र में विचरण के दौरान परमाणु रिएक्टर से संचालित होने की वजह से काफी दिनों तक सतह पर आए बिना ये समुद्र के अंदर कई महीनों तक रह सकती है। जो कि इसकी मुख्य विशेषता मानी जाती है।
इतना ही नहीं अरिहंत परमाणु चालित हमलावर पनडुब्बी से भी बिल्कुल अलग है। क्योंकि ये परमाणु हथियारों के साथ बैलिस्टिक मिसाइल भी ले जा सकती है।















