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सरकारी अस्पताल में पहली बार दिल की दुर्लभ बीमारी की सफल सर्जरी

डॉ. अंबेडकर अस्पताल रायपुर के एडवांस

कार्डियक  इंस्टीट्यूट की बड़ी उपलब्धि

रायपुर। डॉ. अंबेडकर अस्पताल से संबद्ध एसीआई यानी एडवांस कार्डियक इंस्टीट्यूट (Advanced Cardiac institute) में सिकलिंग के साथ दिल की दुर्लभ बीमारी एब्सटीन से पीड़ित 23 साल की महिला मरीज की सफल सर्जरी हुई।

दिल से जुड़ी बीमारियों में 2 लाख में से किसी एक मरीज में ये जटिल बीमारी होती है। जन्मजात होने वाली इस बीमारी के 18 फीसदी मरीज जन्म के साथ ही मौत का शिकार हो जाते हैं। वहीं जो बच पाते हैं वो भी 18 से 20 साल तक ही जिंदा रहते हैं।
छत्तीसगढ़ में पहली बार सिकलिन (Sickle cell) के साथ एब्सटीन (Ebstein anomaly)की बीमारी देखी गई। एसीआई के हार्ट चेस्ट एवं वैस्कुलर सर्जरी के एचओडी डॉ. कृष्णकांत साहू ने बताया कि 23 साल की महिला मरीज एब्सटीन से पीड़ित थी।

ये आपरेशन इसलिए भी अहम है क्योंकि सामान्य मरीजों के दिल के आपरेशन के वक्त दिल और फेफड़े के काम को कुछ देर के लिए रोक दिया जाता है और उसे हार्ट लंग मशीन पर रखा जाता है। इसके लिए सामान्य मरीज के शरीर के तापक्रम को 28 से 30 डिग्री तक ठंडा कर दिया जाता है।
चूंकि महिला मरीज पहले से ही सिकलिंग बीमारी से पीड़ित थी और उसके शरीर में खून की कमी पहले से ही थी। ऐसे में तापमान को कम नहीं किया जा सकता था। सिकलिंग के मरीज के तापमान को कम करने से उसकी आरबीसी यानी लाल रक्त कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त होने की आशंका थी। ऐसे में ओपन हार्ट सर्जरी (Open heart surgery) बहुत अधिक चुनौतीपूर्ण थी। इसलिए सिकलिंग के मरीज के इस तरह की जटिल बीमारी के आपरेशन को बहुत कम समय में अंजाम देना जरूरी हो जाता है।

दिल की जन्मजात बीमारी है एब्स्टीन एनोमली

स्वस्थ्य (दाएं)) और एब्स्टीन एनोमली ग्रसित ह्रदय (बाएं) का अंतर

यह हृदय की जन्मजात बीमारी है। जब बच्चा मां के पेट के अंदर होता है, उस समय पहले 6 हफ्ते में बच्चे के दिल का विकास होता है। इसमें बाधा आने पर बच्चे का हृदय असामान्य हो जाता है। इस बीमारी में मरीज के हृदय का ट्राइकस्पिड वॉल्व ठीक से नही बन पाता और दायां हिस्सा ठीक से विकसित नहीं हो पाता और दिल के ऊपर वाले चैंबर में छेद रहता है। जिसके कारण मरीज के फेफड़ों तक शुद्ध आक्सीजन पहुंचाने के लायक पर्याप्त मात्रा में खून नहीं पहुंच पाता है।
मरीज का शरीर नीला पड़ने लगता है। और वक्त पर इलाज नहीं करवाने से उसकी मौत तक हो सकती है। ये बीमारी दो लाख बच्चों में से किसी एक को होती है। 13% बच्चे जन्म लेते ही मर जाते हैं और 18% बच्चे 10 साल की उम्र तक मर जाते हैं। 20 साल की उम्र तक इस बीमारी से ग्रस्त लगभग सारे मरीज मर जाते है।

अब ऑक्सीजन सेचुरेशन 98 प्रतिशत तक


डॉ. कृष्णकांत साहू के मुताबिक आपरेशन के पहले 23 साल की इस महिला मरीज का आक्सीजन सेचुरेशन 80 से 85 प्रतिशत तक रहता था। जो कि आपरेशन के बाद 98 प्रतिशत पर आ गया है। इतना ही नहीं इस तरह के आपरेशन में मरीज को पेसमेकर लगाने की संभावनाएं 50 फीसदी तक रहती है।

लेकिन इस केस में उसकी जरूरत भी नहीं पड़ी। मरीज को बोवाईन टिश्यू वॉल्व लगाया गया है, जिसे क्वालिटी के हिसाब से सबसे अच्छा माना जाता है। इसकी बनावट मनुष्य के दिल के वॉल्व की तरह ही होती है। मरीज का पूरा इलाज खूबचंद बघेल और आयुष्मान भारत हेल्थ स्कीम के तहत पूरी तरह निशुल्क हुआ है।
ऑपरेशन में शामिल टीम के सदस्यों में हार्ट सर्जन डाॅ. कृष्णकांत साहू विभागाध्यक्ष, डाॅ.निशांत सिंह चंदेल, कार्डियक एनेस्थेटिस्ट डाॅ. तान्या छौडा, परफ्युजनिस्ट चंदन, डिगेश्वर, नर्सिंग राजेन्द्र साहू, मुनेश, चैवाराम, टेक्नीशियन भूपेन्द्र व हरि शामिल हैं।