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अर्देशिर ईरानी, जिन्होंने हमारी फिल्मों को बोलना और गाना सिखाया

आज 54 वीं पुण्यतिथि पर विशेष

पुस्तक अंश- मनोहर महाजन 

“वे सभी जिंदा हैं,सांस ले रहे हैं, सौ फीसदी बोल रहे हैं, 78 मुर्दा इंसान ज़िंदा हो गए, उनको बोलते बातें करते देखो.”
ये लाइनें लिखी थीं- देश की पहली सवाक फ़िल्म के पोस्टर पर..दिन था: शनिवार..तारीख़ थी:14..महीना था:मार्च..वर्ष था :1931..हिन्दोस्तानी सिनेमा में बड़े बदलाव का ‘ऐतिहासिक दिन’.

इसी दिन बम्बई (मुंबई) के मैजेस्टिक सिनेमा हॉल हिंदुस्तान की पहली बोलती-गाती फिल्म ‘आलमआरा’ की रिलीज़ को आज 92 साल हो चुके हैं.

आइये आपको ले चलते हैं, आलम आरा की उस दुनिया में,जहां से हमारे देश की फिल्मों ने ‘बोलना’ और ‘गाना’ सीखा.हालांकि इसी दौर में ‘मूक सिनेमा’ भी लोकप्रियता के चरम पर था. पहली ‘बोलती फ़िल्म’ जिस वर्ष जारी हुई उसी वर्ष मूक-फ़िल्में भी कई कई भाषओं में प्रदर्शित हुई.


पहला बोलता सिनेमा बनाने के लिए अर्देशिर ईरानी को प्रेरणा 1929 में हॉलीवुड की बोलती फिल्म ‘शो बोट’ देखकर मिली थी. इसी फिल्म से उन्हें “आलम आरा” बनाने की प्रेरणा मिली थी. पारसी-रंगमंच के एक लोकप्रिय नाटक को आधार मानकर उन्होंने पटकथा का सृजन किया और नाटक के कई गाने ज्यों के त्यों ले लिए.

उस वक्त के एक इंटरव्यू में आर्देशिर ने कहा था : “हमारे पास कोई संवाद लेखक नही था,गीतकार नहीं था, संगीतकार नहीं था.इन सबकी शुरुआत होनी थी.’ फ़िल्म के संगीत में मात्र तीन साज़ों का इस्तेमाल किया गया : तबला, हारमोनियम और वॉयलिन. संगीतकार गीतकार के रूप में स्वतंत्र-रूप से किसी का भी नाम नही डाला गया. इस फ़िल्म के पहले गायक बने डब्ल्यू.एम.खान याने वज़ीर मोहम्मद ख़ान. ये गाना उन्ही के द्वारा गाया गया और उन्ही पर पिक्चुराइज़्ड था.बोल थे :

“दे दे ख़ुदा के नाम पे प्यारे ताक़त है कुछ देने की..
कुछ चाहे तो मांग ले मुझसे हिम्मत है गर लेने की.
दे दे ख़ुदा के नाम पे प्यारे ताक़त है कुछ देने की..
कुछ चाहे तो मांग ले मुझसे हिम्मत है गर लेने की.”

वज़ीर मोहम्मद ख़ान की उम्र उस समय 29 साल थी.यहां एक और खास बात ज़िक्र करना ज़रूरी हो जाता है.1931 के बाद इसी फ़िल्म ‘आलमआरा’ को उसी तर्ज़, थीम और नाम पर को दो बार बनाया गया.एक बार 1956 में और दूसरी बार 1973 में.दोनों वर्ज़न का निर्देशन एक ही निर्देशक नानूभाई वकील ने ही किया.

1956 के संस्करण में संगीत ए. आर. कुरैशी यानी तबका-नवाज़ अल्लारखा खान का और गीत शेवन रिज़वी के थे. स्टार कास्ट में चित्रा और दलजीत थे. 25 साल के अंतराल के बाद वज़ीर मोहम्मद ख़ान ने इस फ़िल्म में अपनी पहली फ़िल्म आलमआरा (1931) के फ़क़ीर की भूमिका को दोहराया.1973 के संस्करण में संगीत इक़बाल कुरैशी का है और गीत कैफ़ी आज़मी और हसरत जयपुरी के थे.

स्टार-कास्ट में नाज़िमा,अजीत और जयराज थे.पर फ़क़ीर वाली भूमिका एक बार फिर 71 वर्ष के हो चुके वज़ीर मोहम्मद ख़ान ने ही निभाई थी.और इन दोनों फिल्मों में इस गीत को वज़ीर मोहम्मद ख़ान ने ही गया है उसी मूल धुन पर. शब्द भी ओरिजनल फ़िल्म से लिये गए हैं.
बहरहाल पहली बोलती ‘आलमआरा’ का संगीत ‘डिस्क फॉर्म’ में रेकॉर्ड नहीं किया जा सका. फ़िल्म की शूटिंग शुरू हुई तो साउंड की वजह से ही इसकी शूटिंग रात में करनी पड़ती थी. मूक-युग की अधिकतर फ़िल्मों को दिन के प्रकाश में शूट कर लिया जाता था.

लेकिन आलमआरा की शूटिंग रात में होने कारण इसमें कृत्रिम प्रकाश की व्यवस्था करनी पड़ी.यही ‘प्रकाश-प्रणाली’ आने वाले युग के फ़िल्म निर्माण का अहम हिस्सा बनी.यही नही फ़िल्म आलमआरा ने भविष्य के कई ‘स्टार’ और ‘टेक्नीशियंस’ दिए जिनके सहयोग से सवाक-फ़िल्मों का न ख़त्म होने वाला सिलसिला शुरू हुआ.आलमआरा ‘अरेबियन नाइट्स’ जैसी एक फैंटेसी-फ़िल्म थी जिसने हिंदी-उर्दू के मेल से उपजी ‘हिन्दोस्तानी भाषा’ को लोकप्रिय बनाया. इसमें गीत संगीत का अद्भुत संयोजन था जो आज तक भारतीय फ़िल्मों की आधारशिला बना हुआ है.
इस फ़िल्म की नायिका जुबेदा थीं. नायक विट्ठल थे.वे उस दौर के सबसे ज़्यादा मेहनताना पाने वाले स्टार थे. उनके सेलेक्शन को लेकर एक किस्सा बड़ा मशहूर है.विट्ठल की उर्दू अच्छी नहीं होने के कारण उन्हें आलम आरा के नायक के रूप में हटा दिया गया. उनकी जगह उस दौर के उभरते सितारे महबूब को लिया गया ये वही मेहबूब थे जो ‘मदर इंडिया’ जैसी मशहूर फ़िल्मों के निर्माता निर्देशक बने.

विट्ठल उस समय के सफल कलाकार हुआ करते थे.वे नाराज़ हो गये और उन्होंने अर्देशिर ईरानी पर मुक़ाद्दमा दायर कर दिया.उनका मुक़द्दमा उस समय के मशहूर वकील महम्मद अली जिन्ना ने लड़ा था जो बाद में पाकिस्तान के संस्थापक बने. विट्ठल मुक़द्दमा जीत गये और अंतत: आलमआरा के नायक बने.आलमआरा में पृथ्वीराज कपूर,सोहराब मोदी,जगदीश सेठी जैसे कलाकार भी मौजूद थे जो आगे चलकर फ़िल्म उद्योग के प्रमुख स्तंभ बने.
14 मार्च 1931 को बम्बई के मैजेस्टिक सिनेमा हाल में रिलीज़ हुई फ़िल्म आलमआरा 8 हफ्ते तक हॉउसफुल चली. भीड़ का ये आलम था कि पुलिस के लिए भी उस पर नियंत्रण पाने मुश्किल हो गया था. समीक्षकों ने इसे ‘भड़कीली फैंटेसी’ करार दिया,पर दर्शकों के लिए ये एक अनोखा और रोमांचकारी अनुभव था!!

ये फ़िल्म 10 हज़ार फुट लंबी थी और इसके बनने में 4 महीने की लगातार कड़ी मेहनत और चालीस हजार रुपये खर्च हुए थे. एक नई तकनीक से बोलती फ़िल्मों के नए दौर की शुरुआत करने ‘अविश्वसनीय” को ‘यथार्थ’ का जामा पहनाने वाले निर्माता निर्देशक अर्देशिर ईरानी बड़े ‘विनम्र’ और ‘डाउन टू द अर्थ’ थे.

1956 आलमआरा के प्रदर्शन के 25 वर्ष पूरे होने पर उन्हें सम्मानित किया गया और उन्हें “भारतीय फिल्मों का पिता” के नाम से उद्बोधित किया गया तो उन्होंने कहा था:”मैं इतनी बड़ी उपाधि के लायक नहीं.मैंने तो केवल देश के सिनेमा लिए अपना भरसक योगदान देने की कोशिश की है.” आलमआरा का अर्थ होता है: “दुनिया को सजाने वाला” या “विश्व का आभूषण” !! कितना सटीक ‘टाइटल’ या ‘शीर्षक’ था निर्माता निर्देशक अर्देशिर ईरानी की फ़िल्म आलमआरा का, जिसने न सिर्फ़ विश्व भर में भारतीय सिनेमा को स्थापित किया बल्कि सिरमौर बना दिया.
आज उनकी 54 वीं बरसी है-इस महान हस्ती को हम सिनेमा-प्रेमी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं

पुस्तक:”फ़िल्म इतिहास के बिखरे हुए पन्ने’ से साभार