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कच्चे तेल की खरीद पर भारत ने खर्च किए 1.45 लाख करोड़ रुपये, क्या अब महंगे होंगे पेट्रोल-डीजल?

भारत के लिए विदेशों से कच्चा तेल खरीदना महंगा होता जा रहा है। सितंबर 2026 में तेल आयात पर देश का खर्च पिछले साल के मुकाबले 47 फीसदी बढ़कर 15.4 अरब डॉलर यानी करीब 1.45 लाख करोड़ रुपये हो गया। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने भारत के आयात बिल पर दबाव बढ़ाया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी इसका असर दिखाई देगा।पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के आंकड़ों के मुताबिक, तेल आयात की मात्रा में बढ़ोतरी सीमित रही, लेकिन खरीद पर होने वाला खर्च तेजी से बढ़ गया। इसकी बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में आया उछाल है।

सितंबर में कितना बढ़ा तेल का आयात?

सितंबर 2026 में भारत ने करीब 2.17 करोड़ टन कच्चा तेल खरीदा। पिछले साल सितंबर में यह आंकड़ा 2.03 करोड़ टन था। इस तरह आयात की मात्रा में सालाना आधार पर लगभग 7 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई।इस अवधि में भारतीय बास्केट के कच्चे तेल का औसत भाव 116.09 डॉलर प्रति बैरल रहा, जबकि सितंबर 2025 में इसकी कीमत 69.61 डॉलर प्रति बैरल थी। यानी एक साल के भीतर औसत भाव में करीब 67 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर दूसरे देशों पर निर्भर है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने से आयात के लिए अधिक रकम चुकानी पड़ती है। यही कारण है कि तेल की खरीद में सीमित बढ़ोतरी के बावजूद देश का खर्च काफी बढ़ गया।

रूस से सबसे ज्यादा कच्चा तेल खरीद रहा भारत

सितंबर में रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना रहा। समुद्री व्यापार के आंकड़े जुटाने वाली कंपनी Kpler के अनुसार, भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 35 फीसदी रही।रूस के साथ इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत भी भारत को तेल की आपूर्ति करने वाले प्रमुख देश रहे। सितंबर में इन पांच देशों से भारत ने अपने कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 70 फीसदी हिस्सा खरीदा।अलग-अलग देशों से तेल खरीदने के बावजूद भारत अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों में होने वाले बदलाव से अछूता नहीं रह सकता। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका भी कीमतों में उतार-चढ़ाव की वजह बन सकती है।

क्या आम लोगों को पेट्रोल-डीजल के लिए ज्यादा पैसे चुकाने पड़ेंगे?

कच्चे तेल का आयात बिल बढ़ने से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका जरूर पैदा होती है। हालांकि, आयात खर्च में वृद्धि का मतलब यह नहीं है कि घरेलू बाजार में ईंधन के दाम तुरंत बढ़ जाएंगे।पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव, रुपये और डॉलर की विनिमय दर, तेल कंपनियों की लागत, टैक्स और सरकार की नीतियों समेत कई कारकों पर निर्भर करती हैं।यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो तेल कंपनियों की लागत बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में घरेलू ईंधन की कीमतों में बदलाव की संभावना पर नजर रखना जरूरी होगा।

महंगा तेल बढ़ा सकता है महंगाई का दबाव

कच्चे तेल की खरीद पर ज्यादा खर्च होने से भारत के व्यापार घाटे पर दबाव बढ़ सकता है। आयात के लिए अधिक विदेशी मुद्रा की जरूरत रुपये की विनिमय दर को भी प्रभावित कर सकती है।इसके अलावा, तेल महंगा होने से परिवहन और माल ढुलाई की लागत बढ़ने का जोखिम रहता है। इसका असर उत्पादन से लेकर बाजार तक पहुंचने वाली वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है।अगर कंपनियां बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डालती हैं, तो रोजमर्रा की चीजें महंगी हो सकती हैं। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भारत के आयात खर्च के साथ-साथ आम लोगों के घरेलू बजट के लिए भी चिंता का विषय बन सकती है।