बांकी और श्री की लोककथा से जुड़ा है नाग दरबार
मंदिर के पुजारी लहरू बाबा के अनुसार, यहां स्थापित नागदेवता की मूर्ति बांकी और श्री नामक भाई-बहन की मानी जाती है। स्थानीय लोककथा के मुताबिक दोनों सिटोंगा गांव के रहने वाले थे और बेहद गरीब परिवार से थे। बताया जाता है कि दोनों अपनी सौतेली मां के व्यवहार से परेशान रहते थे।किवदंती के अनुसार, एक दिन उनकी मां ने दोनों को भूखे-प्यासे खेत की रखवाली करने के लिए भेज दिया। भूख से परेशान बांकी और श्री ने खेत में मिले सांप के दो अंडे पकाकर खा लिए। इसके बाद दोनों के सर्प रूप धारण करने की मान्यता है।
कुंड से अलग-अलग दिशाओं में निकले और बन गईं दो नदियां
लोकमान्यता के अनुसार सर्प रूप लेने के बाद दोनों खेत में मौजूद एक कुंड में जाकर छिप गए। काफी समय तक घर नहीं लौटने पर उनके माता-पिता उन्हें तलाशते हुए खेत पहुंचे।कहा जाता है कि माता-पिता को अपनी ओर आता देखकर बांकी पश्चिम दिशा की ओर चली गई, जबकि श्री पूर्व दिशा की तरफ निकल गई। स्थानीय जनश्रुति इसी घटना को बांकी और श्री नदियों के उद्गम से जोड़ती है।इसी वजह से क्षेत्र में इन दोनों नदियों को भाई-बहन के रूप में भी देखा जाता है और नाग दरबार की परंपरा में इनका विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है।
नागदेवता के सवार होने की भी प्रचलित है मान्यता
सिटोंगा के नाग दरबार की सबसे अलग परंपराओं में श्रद्धालुओं पर नागदेवता के सवार होने की मान्यता शामिल है। पूजा-अर्चना शुरू होने के बाद कुछ श्रद्धालुओं के व्यवहार में बदलाव दिखाई देने की बात स्थानीय लोग बताते हैं।मान्यता के अनुसार, नागदेवता के प्रभाव में आने वाले श्रद्धालु कुछ समय के लिए नाग जैसी गतिविधियां करने लगते हैं। इसके बाद उन्हें नदी के पास स्थित कुंड में स्नान कराया जाता है। धार्मिक परंपरा के तहत दूध पिलाने के बाद उनके शांत होने की मान्यता भी यहां प्रचलित है।
लोक आस्था और प्रकृति से जुड़ा अनोखा आयोजन
सिटोंगा का नाग दरबार केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि स्थानीय लोककथाओं, नदियों और प्रकृति के साथ ग्रामीण समाज के गहरे जुड़ाव की झलक भी प्रस्तुत करता है। हर साल नागपंचमी पर यहां जुटने वाले श्रद्धालु इस परंपरा को आस्था और विश्वास के साथ निभाते हैं।