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अपने दौर का सुपर स्टार बाल कलाकार, खो गया गुमनामी में 

भारत में लोकप्रियता हासिल करने के बाद मास्टर रतन कुमार

पाकिस्तान चले गए औऱ् वहां भी कई फिल्मों में अभिनय किया

मुंबई। देश की आजादी के बाद हिंदी सिनेमा में बाल कलाकार के तौर पर सुपर स्टार कहलाने वाले मास्टर रतन कुमार बाद के दौर में पाकिस्तान चले गए और वक्त की गर्दिश ने उन्हें गुमनामी में भेज दिया।

आज भी ‘बैजू-बावरा’,’बूट पॉलिश’, ‘दो बीघा जमीन’ और ‘जागृति’ जैसी फिल्में मास्टर रतन कुमार की पहचान है, जिसमें भोला चेहरा और जबरदस्त एक्टिंग दर्शक कभी नहीं भूल पाएंगे।

19 मार्च 1941 को अजमेर इस्टेट में जन्में मास्टर रतन कुमार (मूल नाम सैयद नजीर अली रिजवी) भारत और पाकिस्तान में कई यादगार फिल्में दी। लंबी बीमारी के बाद 13 दिसंबर 2016 को कैलिफोर्निया अमेरिका में उनका निधन हुआ था।
रतन कुमार का भी एक दौर हुआ करता था, उनकी डायलॉग डिलीवरी ऐसी होती थी कि बड़े-बड़े स्टार भी देखते रह जाते थे। इन फिल्मों की बदौलत रतन कुमार 50 के दशक में छा गए थे।

हिंदी फिल्म ‘जागृति’ की रिलीज के बाद रतन कुमार 1956 में पाकिस्तान चले गए। उनकी ये फिल्म सुपरहिट रही जिसके बाद इसे पाकिस्तान में ‘बेदारी’ नाम से बनाया गया। पाकिस्तान में भी इस फिल्म ने सफलता के झंडे गाड़े।

रतन कुमार बूटपालिश में नाज के साथ औऱ् आखिरी दिनों में

बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट तो रतन कुमार सुपरस्टार रहे, लेकिन लीड हीरो के तौर पर वो नहीं चल पाए। शायद ही उनकी कोई फिल्म रही हो जो लीड हीरो के तौर पर हिट रही हो।

जब लीड हीरो के रूप में रतन कुमार ने अपनी शुरुआत की तो शादी भी कर ली। शादी से उनकी एक बेटी हुई, लेकिन एक हादसे में उनकी बेटी की मौत हो गई।

बेटी की मौत ने रतन कुमार को इस कदर तोड़ दिया कि वो खुद को संभाल नहीं पाए और फिल्म इंडस्ट्री को हमेशा हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। फिल्में छोड़ उन्होंने खुद का बिजनेस शुरू किया और कारपेट बेचने लगे।

बिजनेस के सिलसिले में वो यूरोप से लेकर पाकिस्तान तक ट्रैवल करते, लेकिन इसके बाद वो यूएसए जाकर बस गए।

फिल्म जागृति में रतन कुमार

रतन कुमार की पॉपुलैरिटी इस कदर थी कि फिल्म इंडस्ट्री छोड़ने के सालों बाद भी निर्माता-निर्देशक उनके फिल्मों में लौटने का इंतजार करते रहे…पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
1996 में उनके फेफड़ों ने काम करना बंद कर दिया। उस वक्त तो इलाज के बाद सब ठीक हो गया लेकिन साल 2000 में फिर से रतन कुमार के फेफड़ों में कुछ कमी आई और इस बार स्थिति बेहद खतरनाक हो गई।

दो बीघा जमीन में निरूपा रॉय के साथ रतन कुमार

रतन कुमार पूरी तरह से लकवाग्रस्त हो गए और 8 दिनों तक कोमा में रहे….लेकिन वो कहावत है ना ‘जाको राखे साइयां, मार सके न कोय’, रतन कुमार ठीक हो गए और सब नॉर्मल हो गया।

शायद पहले जैसा नहीं। आखिरी के कुछ सालों में रतन कुमार हमेशा ऑक्सीजन पर ही रहते और फिर और फिर 12 दिसंबर 2016 उनकी मौत हो गई।