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चर्चा में कम रहीं लेकिन आज भी गुनगुनाए जाते हैं मीनू के नग्मे

आज जन्मदिन:-पार्श्वगायिका मीनू पुरुषोत्तम ने विभिन्न

भाषाओं में गीत गाए, गैर फिल्मी गजलें भी खूब लोकप्रिय हुईं

फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के कम चर्चित पार्श्वगायिकाओं में मीनु पुरुषोत्तम एक उल्लेखनीय नाम है। उन्होंने दूसरी गायिका के रूप में लता मंगेशकर और आशा भोसले के साथ कई हिट गीत गाए, वहीं मोहम्मद रफी, मन्ना डे, महेंद्र कपूर व दूसरे गायकों के साथ भी उनकी जोड़ी खूब जमी।

मिट्टी की सौंधी सौंधी महक वाली आवाज़ की धनी मीनू पुरुषोत्तम ने बहुत सारे कम बजट की फ़िल्मों में एकल गीत गाए हैं, लेकिन उनके जो चर्चित गानें हैं वह दूसरी गायिकाओं के साथ गाए उनके युगल गीत ही हैं।

जैसे कि लता के साथ फ़िल्म ‘दाग़’ का थिरकता गीत ‘नि मैं यार मनाना नी, चाहे लोग बोलियाँ बोले’, आशा भोसले के साथ ‘ये रात फिर ना आएगी’ का ‘हुज़ूर-ए-वाला जो हो इजाज़त’, सुमन कल्य़ाणपुर के साथ गाया फ़िल्म ‘ताजमहल’ का गीत ‘ना ना ना रे ना ना, हाथ ना लगाना’ और परवीन सुल्ताना के साथ गाया फ़िल्म ‘दो बूंद पानी’ का गीत ‘पीतल की मेरी गागरी’ आदि शामिल हैं। मीनू की गायी हुई ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लें भी काफ़ी मशहूर हैं।

मीनू पुरुषोत्तम का जन्म 20 नवंबर 1944 को पंजाब के पटियाला में एक कृषक परिवार में हुआ था। बचपन से ही संगीत में दिलचस्पी होने के कारण उन्होने शास्त्रीय संगीत की तालीम सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक और गुरु पंडित लक्ष्मण प्रसाद जयपुरवाले से हासिल की। बम्बई आकर मीनू ने संगीत में विशारद (स्नातक) की उपाधि प्राप्त की। जहाँ तक फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखने की बात है, तो उन्हे केवल 16 वर्ष की आयु में ही इस क्षेत्र में क़दम रखने का मौका मिला, जब संगीतकार रवि ने पहली बार उन्हे अपनी फ़िल्म ‘चायना टाउन’ में मोहम्मद रफ़ी के साथ एक डुएट गाने का मौका दिया।

मोहम्मद रफी और मन्ना डे के साथ मीनू पुरुषोत्तम

1962 की इस फ़िल्म का वह गीत ‘देखो जी एक बाला जोगी मतवाला’ था। यहीं से शुरुआत हुई मीनू पुरुषोत्तम के फ़िल्मी गायन की। फिर उसके बाद तो कई संगीतकारों ने उनसे गानें गवाए जिनमें रोशन, मदन मोहन, ओ. पी. नय्यर, जयदेव, और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जैसे कई बड़े नाम शामिल हैं।

आशा भोसले के साथ मीनू पुरुषोत्तम

मीनू पुरुषोत्तम स्टेज पर बेहद सक्रिय रहीं हैं। देश और विदेश में बराबर उन्होने शोज़ किए हैं नामी गायकों के साथ, जिनमें शामिल हैं मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, तलत महमूद और महेन्द्र कपूर। ग़ज़ल और भजन गायकी में अपना एक अलग मुक़ाम हासिल करते हुए उनके कई एल. पी रिकार्ड्स बनें हैं।

जिनमें ‘रंज में राहत’, ‘रहगुज़र’, ‘ओ सलौने सांवरिया’, ‘भक्ति रस’, ‘कृष्ण रास’, ‘दशावतार’, ‘गुजराती वैष्णव भजन’, ‘मनमन्दिर में साईं’, और ‘जागो जागो माँ जवालपा’ शामिल हैं। हिंदी और अपनी मातृभाषा पंजाबी के अलावा मीनू ने मराठी, बंगला, भोजपुरी और सिंधी जैसी भाषाओं में भी बहुत से गानें गाएं हैं। मीनू ने 80 के दशक में फिल्मों में गाना कम कर दिया। वहीं एक समय के बाद वह अमेरिका में जाकर बस गईं।

छत्तीसगढ़ी में भी गाया है मीनू ने

छत्तीसगढ़ी फिल्म कहि देबे संदेश के गीत ‘हो रे हो रे हो रे’ का दृश्य

गायिका मीनू पुरुषोत्तम ने पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘कहि देबे संदेस’ में भी एक गीत गाया है। जिन दिनों मीनू अपने करियर को स्थापित करने संघर्ष कर रही थी, उन दिनों वह मुंबई में वरिष्ठ संगीतकार मलय चक्रवर्ती के पास संगीत भी सीखा करती थीं।

उन दिनों मनु नायक पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘कहि देबे संदेस’ का निर्माण कर रहे थे और मलय चक्रवर्ती इस फिल्म का संगीत रच रहे थे।

मलय चक्रवर्ती ने मीनू पुरुषोत्तम और महेंद्र कपूर की आवाज में छत्तीसगढ़ी ददरिया गीत ‘हो रे हो रे हो रे..’ गवाया है। जिसमें मीनू की गायिकी की रेंज को समझा जा सकता है।