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उम्र के 13 से 29 साल तक भारत में रहे यीशु…?

आज क्रिसमस पर विशेष-यीशु के जीवन के इन रहस्यमय वर्षों

को साइलेंट इयर्स, लॉस्ट इयर्स या मिसिंग इयर्स कहा जाता है

ध्रुव गुप्त

विश्व इतिहास के महानतम व्यक्तित्वों में एक जीसस या ईसा के जीवन का एक बड़ा कालखंड ऐसा है जिसके बारे में बाइबिल सहित किसी प्राचीन ग्रन्थ में कोई ज़िक्र नहीं है। 12 वर्ष की आयु तक उनकी गतिविधियों का उल्लेख बाइबिल में मिलता है। उन्हें यरुशलम में पूजास्थलों में उपदेशकों के बीच में बैठे, उनकी सुनते और उनसे प्रश्न करते हुए पाया गया।

उनकी अनंत जिज्ञासाओं से वहां पुजारी भी अचंभित हुए थे। उनकी दिव्यता और नए विचारों की चर्चा फैली तो रूढ़िवादियों की नज़र उनपर गड़ने लगी। उनकी जान को खतरा देख उनके पिता जोसेफ उन्हें अपने साथ नाजरथ ले गए जहां जीसस ने पिता के बढ़ईगिरी के काम में कुछ अरसे तक हाथ बंटाया।

इसके बाद तेरह से उनतीस साल के जीसस के जीवन के बारे में कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता। जीसस के जीवन के इन रहस्यमय वर्षों को ईसाई जगत में साइलेंट इयर्स, लॉस्ट इयर्स या मिसिंग इयर्स कहा जाता है। उसके बाद जीसस ने सीधे तीस वर्ष की उम्र में येरुशलम लौटकर यूहन्ना से दीक्षा ली और चालीस दिनों के उपवास के बाद लोगों को धार्मिक शिक्षा देने लगे।

उन्होंने कहा कि ईश्वर एक है, प्रेमरूप है, वे स्वयं ईश्वर के पुत्र और स्वर्ग और मुक्ति का मार्ग हैं। कर्मकांडी और बलिप्रेमी यहूदियों को उनकी लीक से हटकर शिक्षायें रास नहीं आईं और उन्होंने जीसस को तैतीस साल की उम्रमें क्रूस पर लटका दिया।

जीसस के लॉस्ट इयर्स की खोज पहली बार1887 ई में एक रुसी खोजकर्ता नोटोविच ने की। प्रमाणों के साथ उन्होंने और इस रहस्यमय कालखंड में जीसस के भारत में रहने का रहस्योद्घाटन किया। कश्मीर भ्रमण के दौरान जोजीला दर्रे के समीप एक बौद्धमठ में नोटोविच की मुलाक़ात एक बौद्ध भिक्षु से हुई थी जिसने उन्हें बोधिसत्व प्राप्त एक ऐसे संत के बारे में बताया जिसका नाम ईसा था।

भिक्षु से हासिल विस्तृत जानकारी के बाद नोटोविच ने ईसा और जीसस के जीवन में कई समानताएं रेखांकित की। उसने लद्दाख के लेह मार्ग पर स्थि‍त प्राचीन हेमिस बौद्घ आश्रम में रखी कई पुस्तकों के अध्ययन के बाद ‘द लाइफ ऑफ संत ईसा’ नामक एक पुस्तक लिखी।

इस चर्चित किताब के अनुसार इस्राएल के राजा सुलेमान के समय से ही भारत और इजराइल के बीच घनिष्ठ व्यापार-संबंध थे। भारत से लौटने वाले व्यापारियों ने भारत के ज्ञान की प्रसिद्धि के किस्से दूर-दूर तक फैलाए थे।

इन किस्सों से प्रभावित होकर जीसस ज्ञान प्राप्त करने के उद्धेश्य से बिना किसी को बताये सिल्क रूट से भारत आए और सिल्क रूट पर स्थित इस आश्रम में तेरह से उनतीस वर्ष की उम्र तक रहकर बौद्घ धर्म, वेदों तथा संस्कृत और पाली भाषाओं की शिक्षा ली। उन्होंने संस्कृत में अपना नाम ईशा रख लिया था जो यजुर्वेद के मंत्र 40:1 में ईश्वर का प्रतीक शब्द है। यहां से शिक्षा लेकर वे येरूसलम लौट गए थे।

जीसस के भारत आने का एक प्रमाण हिन्दू धर्मग्रन्थ ‘भविष्य पुराण’ में भी मिलता है जिसमें ज़िक्र है कि एक कुषाण राजा शालिवाहन की मुलाकात हिमालय क्षेत्र में सुनहरे बालों वाले एक ऐसे ऋषि से होती है जो अपना नाम ईसा और अपना जन्म एक कुंवारी मां के गर्भ से बताता है।

लद्दाख की कई जनश्रुतियों में भी ईसा के बौद्ध मठ में रहने के उल्लेख मिलते हैं। विश्वप्रसिद्ध स्वामी परमहंस योगानंद की किताब ‘द सेकंड कमिंग ऑफ क्राइस्ट: द रिसरेक्शन ऑफ क्राइस्ट विदिन यू’ में यह दावा किया गया है कि ईसा ने भारत में कई वर्ष रहकर भारतीय ज्ञान दर्शन और योग का गहन अध्ययन और अभ्यास किया था।

स्वामी जी के इस शोध पर ‘लॉस एंजिल्स टाइम्स’ और ‘द गार्जियन’ ने लंबी रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसकी चर्चा दुनिया भर में हुई। इयान कोल्डवेल की एक किताब ‘फिफ्त गॉस्पल’ जीसस की जिन्दगी के रहस्यमय पहलुओं की खोज करती है।इस किताब काभी यही मानना है कि तेरह से उनतीस वर्ष की उम्र तक ईसा भारत में रहे।

कई शोधकर्ताओं ने इस आधार पर भी ईसा के लंबे अरसे तक भारत में रहने को विश्वसनीय माना है कि जीसस और बुद्ध की शिक्षाओं में काफी हद तक समानता देखने को मिलती है। अहिंसा, प्रेम, त्याग, सेवा, क्षमा हिन्दू-बौद्ध दर्शन के मूल तत्व थे जो समकालीन दूसरे धर्मों में देखने को नहीं मिलते।

जीसस में सबसे बड़ी बात उनकी पवित्र आत्मा की अवधारणा है। जीवात्मा का सिद्धांत भारतीय दर्शन का हिस्सा है। ईसा से पहले आत्मा की अवधारणा पश्चिम में नहीं थी। ईसा ने इसे परमेश्वर के अभिन्न अंग के रूप में स्वीकार किया, जिसे चित्रों में सफ़ेद कबूतर के रूप में दर्शाया जाता है।

अबतक की खोजों से दुनिया भर में शोधकर्ताओं के एक बड़े हिस्से द्वारा माना जाने लगा है कि जीसस के लॉस्ट इयर्स के सुराग भारत में ही मिलते हैं। उनकी जड़ें भारतीय धर्म और दर्शन में हैं। भारत ने ही उनके मानस को गढ़ा और उन्हें जीसस से जीसस क्राइस्ट बनाया।

क्या कश्मीर में बीते ईसा मसीह के आखिरी दिन, श्रीनगर में है कब्र!

ईसा मसीह के जन्म के बारे में सबको मालूम है, लेकिन उनकी मृत्यु को लेकर कई बातें प्रचलित हैं. उसमें एक बात ये भी है कि ईसा का निधन येरूशलम में नहीं बल्कि कश्मीर में हुआ था. सूली पर लटकाए जाने के बाद भी वो जिंदा थे. वो दो दिन बाद वहां से गायब हो गए. उसके बाद सिल्क रूट से होते हुए वो कश्मीर पहुंचे. उन्होंने अपना आखिरी जीवन यहीं गुजारा.

कहा जाता है कि जब इजरायल में ईसा मसीह को सलीब पर लटकाया गया तो उसके दो दिन बाद तक वो जिंदा रहे थे. फिर रहस्यमय तरीके से गायब हो गए. कहां गायब हो गए ये रहस्य है. आज भी इसे लेकर बहुत सी बातें प्रचलित हैं. इस रहस्य का संबंध ईसा और कश्मीर के बीच के सिरों से जुड़ता है. इतिहासकारों और शोधकर्ताओं का मानना है कि ईसा का ये रहस्यकाल कश्मीर में बीता.

बीबीसी में करीब दो दशक पहले सैम मिलर ने एक रिपोर्ट लिखी. उसमें उन्होंने श्रीनगर के बाहर बनी एक प्राचीन रोजाबल दरगाह को जीसस टॉम्ब के तौर पर संबोधित किया. केवल वही नहीं यूरोप और अमेरिका से जितने टूरिस्ट कश्मीर जाते हैं, उन सभी की उत्सुकता श्रीनगर जाकर जीसस टॉम्ब देखने की होती है. माना जाता है कि निधन के बाद ईसा मसीह को यहीं दफनाया गया. ये कब्र आज भी मौजूद है. इसे दो हजार साल से कहीं ज्यादा पुराना बताया जाता है.

इसी रिपोर्ट में मिलर लिखते हैं कि ये दरगाह एक पुरानी बिल्डिंग में है. पहले तो इसके बारे में बहुत कम लोग जानते थे लेकिन अब ज्यादातर लोग यहां जाना चाहते हैं लेकिन ये इतना आसान नहीं रह गया है. श्रीनगर के रोजाबल श्राइन को ईसा मसीह की करीब दो हजार साल पुरानी कब्र माना जाता है. “दा विंची कोड” के बेस्ट सेलर बुक बनने के बाद इस टॉम्ब को लेकर दुनियाभर में उत्सुकता जग गई.

वेटिकन बेशक सिरे से इस बात को खारिज करता है लेकिन ये बात इतने ढेर सारे तथ्यों के साथ कही जाती हैं और इसके पक्ष में ऐसे साक्ष्यों का दावा किया गया है कि लगता है कि ऐसा हुआ हो तो हैरानी नहीं होनी चाहिए.

कई शोधकर्ताओं का मानना है कि जीसस की मृत्यु सूली पर चढ़ाने से नहीं हुई थी. सूली पर चढ़ाए जाने के बाद भी वो बच गए. फिर मध्यपूर्व के रास्ते भारत आ गए. भारत वो इसलिए आए ,क्योंकि अपनी युवावस्था में भी वो यहां आ चुके थे. फिर उनका जीवन भारत में बीता. रोजाबाल में जिस शख्स का मकबरा है, उसका नाम यूजा आसफ है. शोधकर्ताओं का मानना है कि यूजा आसफ कोई और नहीं बल्कि ईसा मसीह या जीसस ही हैं.

तमाम डॉक्यूमेंट्रीज और किताबों में जिक्र

क्राइस्ट के भारत आने पर बीबीसी लंदन ने 42 मिनट की डॉक्यूमेंट्री ‘जीसस इन इंडिया’ बनाई. श्रीलंका में करीब सवा घंटे की एक डॉक्यूमेंट्री बनाई गई- ‘ जीसस वाज ए बौद्धिस्ट मंक’. ईसा के भारत आने पर तमाम किताबें लिखी गईं. कई दशकों पहले कश्मीर के जाने-माने लेखक अजीज कश्मीरी ने अपनी किताब ‘ क्राइस्ट इन कश्मीर’ से लोगों को ध्यान खींचा. आंद्रेयस फेबर कैसर ने ‘ जीसस डाइड इन कश्मीर ‘ लिखी तो जाने माने लेखक एडवर्ड टी मार्टिन ने ‘किंग ऑफ ट्रेवलर्सः जीसस लास्ट ईयर इन इंडिया’ लिखी.

पहलगाम में यहूदी नस्ल के बाशिंदे

सुजैन ओस ने भी इसी विषय पर चर्चित किताब लिखी. जम्मू-कश्मीर आर्कियोलॉजी, रिसर्च एंड म्यूजियम में अर्काइव विभाग के पूर्व डायरेक्टर डॉ. फिदा हसनैन जब लद्दाख गए तो उन्होंने इस बारे में बौद्ध मठ में एक दस्तावेज देखा, तो उनकी भी दिलचस्पी इसमें पैदा हुई.

तब उन्होंने राज्य में इस बारे में पुरानी किताबें और साक्ष्य तलाशने शुरू किए. जो कुछ उन्हें मिला, वो इशारा करता था कि ईसा के भारत आने की बात में दम है. पहलगाम का क्षेत्र डीएनए संरचना के अनुसार मुसलमान बने यहूदी नस्ल के लोगों से भरा हुआ है.


रोजाबल दरगाह की ये कब्र उत्तर पूर्व दिशा में है, इसे ईसा की कब्र माना जाता है

सवाल भी हैं

कई विद्वानों ने शोध से साबित करने की कोशिश की कि ये कब्र किसी और की नहीं, बल्कि ईसा मसीह या जीसस की है. सवाल उठता है कि अगर जीसस की मौत सूली पर चढ़ाए जाने की वजह से येरूशलम में हुई तो उनका मकबरा 2500 किमी दूर कश्मीर में कैसे हो सकता है.

बाइबल भी ईसा को सूली पर चढ़ाने के बाद उनके 12 बार अलग-अलग समय पर लोगों के सामने आकर मानव रूप में जीवित होने का प्रमाण देती है.

 

कब्र में बड़े पैर के निशान, जिसमें दोनों पैरों में कील ठोके जाने के निशान नजर आ रहे हैं. ये रोजाबल दरगाह में रखे हुए हैं.

क्या युवाकाल में भी भारत आए थे ईसा

ईसा मसीह ने 13 साल से 30 साल की उम्र के बीच क्या किया, ये रहस्य सरीखा ही है. बाइबल में उनके इन वर्षों का कोई जिक्र नहीं मिलता.

लेकिन ऐसा कहा जाता है और ऊपर जिन तमाम लेखकों का नाम आया है उन्होंने भी लिखा है कि शायद अपने युवावय में वो भारत आए थे, यहां वो कई जगहों पर भ्रमण करते रहे. जब वो लौटे तो फिर उन्होंने येरूशलम में योहन्ना से दीक्षा ली.

इसके बाद वो इजराइल में जगह-जगह उपदेश देने लगे. उनके इन उपदेश तत्कालीन धर्माचार्यों और सत्ता को पसंद नहीं थे. ज्यादातर विद्वानों के अनुसार सन 29 ई. को ईसा येरूशलम पहुंचे. वहीं उनको दंडित करने का षड्यंत्र रचा गया. जब उन्हें सलीब पर लटकाया गया, उस वक्त उनकी उम्र करीब 33 वर्ष थी.

किस रूट से भारत आए

सूली पर लटकाए जाने के दो दिन बाद उन्हें जीवित देखा गया. फिर वो गायब हो गए. कभी यहूदी राज्य में नजर नहीं आए. फिर उनके कश्मीर में होने का उल्लेख है. ईसा ने दमिश्क, सीरिया का रुख करते हुए सिल्क रूट पकड़ा. वह ईरान, फारस होते हुए भारत पहुंचे. कश्मीर में वो 80 वर्ष की उम्र तक रहे.


जीसस के भारत आने को लेकर कई किताबें लिखी गईं. जिसमें उनके कश्मीर आकर रहने का उल्लेख है

अहमदिया समुदाय भी मानता है

हिंदू ग्रंथ “भविष्यपुराण” में भी कथित उल्लेख है कि ईसा मसीह भारत आए थे. उन्होंने कुषाण राजा शालीवाहन से मुलाकात की थी. मुस्लिमों का अहमदिया समुदाय भी यकीन करता है कि रोजाबल में मौजूद मकबरा ईसा या जीसस का ही है.

अहमदिया समुदाय के संस्थापक हजरत मिर्जा गुलाम अहमद ने 1898 में लिखी अपनी किताब ‘मसीहा हिंदुस्तान में ‘ ये लिखा कि रोजाबल स्थित मकबरा जीसस का ही है जिनकी शादी कश्मीर प्रवास के दौरान मरजान से हुई. उनके बच्चे भी हुए.

रूसी विद्वान ने पहली बार किया था दावा

जर्मन लेखक होलगर्र कर्सटन ने अपनी किताब ‘जीसस लीव्ड इन इंडिया’ में इस बारे में विस्तार से लिखा है. पहली बार सन 1887 में रूसी विद्वान, निकोलाई अलेक्सांद्रोविच नोतोविच ने संभावना जाहिर की थी कि शायद जीसस भारत आए थे. नोतोविच कई बार कश्मीर आए थे. जोजी ला पास के नजदीक स्थित एक बौद्ध मठ में वो मेहमान थे, जहां एक भिक्षु ने उन्हें एक बोधिसत्व संत के बारे में बताया जिसका नाम ईसा था.

नोतोविच ने पाया कि ईसा औऱ जीसस क्राइस्ट के जीवन में कमाल की समानता है. निकोलस नोतोविच एक रूसी यहूदी राजदूत, राजनीतिज्ञ और पत्रकार थे. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय तौर पर पहली बार ये दावा किया था.


रूसी विद्वान और लेखक निकोलाई नोतोविच, जो लद्दाख के बौद्ध मठ में ठहरे और फिर “अननोन ईयर्स ऑफ जीसस” किताब लिखी

क्या कहती है भारत सरकार की डॉक्यूमेंट्री

इस बारे में भारत सरकार के फिल्म प्रभाग की करीब 53 मिनट की डॉक्यूमेंट्री ”जीसस इन कश्मीर” कमाल की है. इसने बहुत प्रमाणिक ढंग से बताया है कि किस तरह जीसस भारत में आकर रहे. उनका ये प्रवास लद्दाख और कश्मीर में था.

हालांकि रोमन कैथोलिक चर्च और वेटिकन इसे नहीं मानते. ये डॉक्यूमेंट्री इशारा करती है कि जीसस अपने खास लोगों के साथ कश्मीर आए थे. फिर यहीं के होकर रह गए. उनके साथ आए यहूदी यहीं के बाशिंदे हो गए.


इजरायल का ये ट्राइबल मैप बताता है कि सैकड़ों साल पहले जो कबीले वहां से गायब हो गए थे, वो अब कश्मीर में हैं. ये लोग अपने नाम भी उसी तरह रखते हैं, जिस तरह इजरायली.

इजरायल के 10 यहूदी कबीलों के वंशज कश्मीर में

भारत सरकार के फिल्म प्रभाग की ये डॉक्यूमेंट्री प्रमाणिक रूप से भारत में ईसा मसीह के संबंध पर ध्यान खींचती है. भारतीय सेंसर बोर्ड से पास इस डॉक्यूमेंट्री में 2000 साल पुराने शिव मंदिर के अभिलेखों, संस्कृत और बौद्ध पांडुलिपियों में यीशू के यहूदी नाम यसूरा के इस्तेमाल, सम्राट कनिष्क के अनदेखे सिक्कों और तिब्बती ऐतिहासिक पांडुलिपियों द्वारा उनके कश्मीर आने को साबित किया गया है.

इजरायल के कुल 12 यहूदी कबीलों में गुम हुए 10 यहूदी कबीलों में कुछ के वंशज अफगान और कश्मीर में ही बसे हुए हैं. उन्हें “बनी इजरायल ” कहा जाता है. वो सभी बेशक मुस्लिम बन चुके हैं, लेकिन उनका खानपान और रीति रिवाज कश्मीरियों से अलग हैं. वो कश्मीरियों से रोटी-बेटी के संबंध नहीं रखते.

कहां है श्रीनगर में ये कब्र

श्रीनगर के जिस छोटे से मोहल्ले खानयार में ये कब्र बताई जाती है. वो पिछले कुछ सालों में दुनियाभर के ईसाईयों और धार्मिक इतिहासकारों के आकर्षण का केंद्र भी बनती रही है.

खानयार के रोजाबल में जो कब्र है, वो उत्तर-पूर्व दिशा में है जबकि मुसलमानों की कब्रें दक्षिण-पश्चिम में होती हैं.