बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम अंतरिम आदेश में कहा है कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ आपराधिक मुकदमा और विभागीय जांच एक ही आरोपों तथा समान साक्ष्यों पर आधारित हो, तो दोनों कार्यवाहियां समानांतर रूप से चलाना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। अदालत ने कोरबा जिले में पदस्थ एक सब इंस्पेक्टर के खिलाफ चल रही विभागीय जांच पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है।
एफआईआर के बाद शुरू हुई थी विभागीय कार्रवाई
मामला कोरबा जिले के पसान थाने में पदस्थ सब इंस्पेक्टर एस.के. कोशरिया से जुड़ा है। उनके खिलाफ कटघोरा थाने में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धारा 332 और 74 के तहत आपराधिक मामला दर्ज किया गया था। एफआईआर दर्ज होने के करीब दो महीने बाद पुलिस अधीक्षक, कोरबा ने उन्हीं आरोपों के आधार पर विभागीय जांच शुरू करते हुए आरोप पत्र जारी कर दिया।
हाईकोर्ट में दी गई चुनौती
विभागीय कार्रवाई को चुनौती देते हुए एस.के. कोशरिया ने अपने अधिवक्ताओं अभिषेक पाण्डेय और सुंदरा साहू के माध्यम से छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। याचिका में कहा गया कि जब आपराधिक मामला पहले से न्यायालय में विचाराधीन हो और विभागीय जांच भी उसी घटनाक्रम एवं समान साक्ष्यों पर आधारित हो, तब दोनों प्रक्रियाओं का एक साथ संचालन प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
निष्पक्ष बचाव के अधिकार का दिया हवाला
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि समानांतर कार्रवाई से कर्मचारी के निष्पक्ष बचाव का अधिकार प्रभावित हो सकता है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले एम. पॉल एंथोनी बनाम भारत गोल्ड माइंस लिमिटेड समेत अन्य निर्णयों का हवाला देते हुए बताया गया कि ऐसी परिस्थितियों में विभागीय जांच पर रोक लगाने का सिद्धांत पहले से स्थापित है।
हाईकोर्ट ने दिया अंतरिम संरक्षण
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता के तर्कों को स्वीकार करते हुए विभागीय जांच पर अंतरिम रोक लगा दी। अदालत ने पुलिस अधीक्षक, कोरबा को निर्देश दिया कि अगली सुनवाई तक एस.के. कोशरिया के खिलाफ विभागीय जांच की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जाए।
सरकारी कर्मचारियों से जुड़े मामलों के लिए अहम आदेश
कानूनी जानकारों के अनुसार, यह आदेश उन मामलों में महत्वपूर्ण माना जाएगा, जहां किसी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध समान आरोपों और समान साक्ष्यों के आधार पर आपराधिक मुकदमा तथा विभागीय जांच एक साथ संचालित की जा रही हो। अदालत ने संकेत दिया है कि ऐसी स्थिति में न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और कर्मचारी के बचाव के अधिकार का संरक्षण सर्वोपरि है।











