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कागजी दावों से कैसे बदलेगा छत्तीसगढ़ की खेती का भूगोल?—पारसनाथ साहू

धान छोड़ो, 15000 पाओ—

आरंग- छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार ने प्रदेश में फसल चक्र परिवर्तन (क्रॉप रोटेशन) को रफ्तार देने के लिए 15,000 रुपये प्रति एकड़ प्रोत्साहन राशि देने का एक बड़ा दांव खेला है। सरकार की मंशा है कि धान के बदले दलहन, तिलहन, मक्का, कोदो-कुटकी, रागी और कपास जैसी नकदी व मोटे अनाज की फसलों को बढ़ावा देकर राज्य में खेती की तस्वीर बदली जाए। हालांकि, इस सरकारी उत्साह के बीच जमीनी हकीकत से जुड़े किसान नेता पारसनाथ साहू ने तीखे और सुलगते सवाल दाग दिए हैं। उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा कि छत्तीसगढ़ के जमीनी भूगोल और किसानों की व्यावहारिक दिक्कतों को समझे बिना यह योजना महज एक कागजी कसरत बनकर रह जाएगी।किसान नेता पारसनाथ साहू ने सरकार को छत्तीसगढ़ की माटी और खेतों की पारंपरिक बनावट की याद दिलाते हुए कहा कि दलहन, तिलहन और मोटे अनाजों की खेती मुख्य रूप से ‘भर्री’ और ‘भाठा’ यानी ढलान वाली और कम पानी रोकने वाली जमीनों पर ही कारगर होती है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में प्रदेश के खेतों का परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। जिन जमीनों पर कभी दलहन-तिलहन उगता था, किसानों ने अपने खून-पसीने की कमाई और भारी पैसा लगाकर उन्हें समतल कर दिया है ताकि वे धान उगाने के लायक बन सकें। अब अगर साय सरकार चाहती है कि किसान फिर से उन खेतों में दलहन-तिलहन लगाए, तो उसे सिर्फ प्रोत्साहन राशि देने से काम नहीं चलेगा। सरकार को कृषि भूमि के दोबारा सुधार और उसे ढलान युक्त बनाने के लिए भारी-भरकम और पर्याप्त बजट की व्यवस्था करनी होगी।साहू ने सीधे तौर पर साय सरकार की नीयत पर भी सवाल उठाया और अंदेशा जताया कि कहीं यह योजना सिर्फ धान की बंपर खरीदी के भारी-भरकम वित्तीय बोझ से बचने का कोई शॉर्टकट तो नहीं है। उन्होंने साफ किया कि किसान तभी दूसरी फसलों का रुख करेगा जब उसे धान से ज्यादा या उसके बराबर सीधा फायदा दिखेगा। इसके लिए उन्होंने मांग की है कि दलहन, तिलहन, कपास, फल-फूल, औषधीय पौधों और सब्जियों का किसानों को विश्वास में लेकर एक लाभकारी समर्थन मूल्य तय किया जाए। सिर्फ दाम तय करने से भी काम नहीं चलेगा, बल्कि साय सरकार को इन सभी वैकल्पिक फसलों की शत-प्रतिशत सरकारी खरीदी की ‘कानूनी गारंटी’ देनी होगी, जिसकी घोषणा तत्काल की जानी चाहिए। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ में बड़े पैमाने पर फूड प्रोसेसिंग (खाद्य प्रसंस्करण) संयंत्र स्थापित करने होंगे, ताकि किसानों की उपज को स्थानीय स्तर पर सही बाजार मिल सके और फसलें कौड़ियों के दाम न बिकें।योजना की सबसे बड़ी व्यावहारिक कमजोरी और जमीनी चुनौती पर चोट करते हुए किसान नेता ने कहा कि आज छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में सबसे बड़ा आतंक आवारा मवेशियों, बंदरों और ‘बरहा’ (जंगली सूअरों) का है। अगर कोई किसान हिम्मत करके अरहर, तिल या साग-सब्जी जैसी फसलें लगा भी लेता है, तो ये खुले मवेशी और जंगली जानवर रातभर में पूरी मेहनत का सत्यानाश कर देते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि वन्य पशुओं को भगाने या खेतों को सुरक्षित रखने के लिए शासन-प्रशासन से बार-बार निवेदन करने पर भी कोई सहयोग नहीं मिलता और न ही जंगली जानवरों द्वारा क्षतिग्रस्त की गई फसलों का किसानों को कोई मुआवजा दिया जाता है।उन्होंने स्पष्ट किया कि छत्तीसगढ़ का किसान सरकार की नीतियों में सहयोग करने से कभी पीछे नहीं हटता और आज भी तैयार है। लेकिन विष्णुदेव साय सरकार को यह समझना होगा कि कोई भी किसान अपनी सालभर की आजीविका को किसी अनिश्चित योजना के भरोसे दांव पर नहीं लगा सकता। अगर सरकार वाकई चाहती है कि छत्तीसगढ़ ‘धान के कटोरे’ के तमगे के साथ-साथ दलहन-तिलहन में भी आत्मनिर्भर बने, तो उसे 15,000 रुपये की प्रोत्साहन राशि के आगे बढ़कर दूध, सब्जी, फल और दालों की सरकारी खरीदी का एक सुरक्षित, पारदर्शी और जंगली जानवरों से रक्षित तंत्र तैयार करना होगा।