श्रीनगर। घाटी की लाइफलाइन कहा जाने वाला श्रीनगर-जम्मू हाईवे (एनएच-44) भारी वाहनों के लिए करीब 21 दिन बाद बुधवार को खोल दिया गया। हालांकि, इस दौरान हजारों ट्रकों में लदे सेब सड़ते रहे। सोपोर फल मंडी अध्यक्ष फयाज अहमद मलिक के मुताबिक, करीब 5000 ट्रक सड़क पर फंसे रहे। एक ट्रक की कीमत 10-12 लाख रुपए होती है, जबकि बांग्लादेश जाने वाले ट्रकों की कीमत 20-25 लाख तक बैठती है। आरोप है कि केंद्र और राज्य, दोनों ही बारिश और भूस्खलन से बार-बार आने इस संकट से निपटने में नाकाम रहे हैं।
हालात बिगड़ते देख सरकार ने हाईवे पूरा खुलने से पहले ही करीब 2,000 ट्रकों को शोपियां-राजौरी-पुंछ होकर गुजरने वाली मुगल रोड से भेजने की इजाजत दी थी। इससे पहले सोमवार को सेब के लिए श्रीनगर-दिल्ली सीधी पार्सल ट्रेन शुरू की गई लेकिन सेब किसानों का कहना है कि यह केवल 10 ट्रकों के बराबर है, जबकि इन दिनों सिर्फ सोपोर मंडी से रोजाना 400 ट्रक निकलते हैं और अगले हफ्तों में यह संख्या 1,000 तक पहुंच जाएगी।
कश्मीर की रीढ़ है सेब
सेब को घाटी की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। कश्मीर भारत की 75त्न सेब उत्पादन की जरूरत पूरी करता है। करीब 50 लाख लोग सीधे या परोक्ष रूप से इससे जुड़े हैं। कश्मीर की 1.45 लाख हेक्टेयर से ज्यादा जमीन पर सेब की खेती होती है, जिनमें सबसे ज़्यादा ‘डिलिशियस’ किस्म के सेब हैं, उसके बाद ’अमरीकन’ और ’महाराजी’ किस्म है।












