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अंग्रेजी राज की खौफनाक दास्तां-जब 246 हिंदुस्तानियों को कुएं में जिंदा दफन कर दिया था गोरों ने

157 साल पुरानी वहशियत के राज उगले मिट्‌टी ने, छत्तीसगढ़ में खौलते तेल में डाल दिया था आदिवासी को

नई दिल्ली। अंग्रेजी राज का वो खौफनाक मंजर आज की मिट्‌टी उगल रही है। जिसने भी देखा हैरान रह गया। लोग सिहर उठे कि आखिर कैसे फिरंगियों ने इतनी बड़ी तादाद में हमारे हिंदुस्तानी पुरखों को अंधेरे कुएं में दफन कर दिया था..?
हाल ही में पंजाब के अजनाला में जब इस कुएं ने राज उगलना शुरू किया तो फिर से वही खौफनाक दास्तान लोगों के सामने आ गई। वैसे, कुछ ऐसा ही खौफनाक इतिहास छत्तीसगढ़ की धरा पर भी लिखा गया था। आईए, जानते हैं अतीत के इन दोनों अत्याचार को।
पंजाब के अजनाला कस्बे के कुएं में मिले नरकंकाल उन 246 भारतीय सैनिकों के हैं, जिन्हें 1857 के विद्रोह के दौरान अंग्रेजों ने बेरहमी से मार दिया था। मारे गए सैनिक गंगा के मैदानी इलाकों के रहने वाले थे।
इस समूचे इलाके पर हुए वैज्ञानिक परीक्षण को 26 अप्रैल को ‘फ्रंटियर्स इन जेनेटिक्स’ नाम के जर्नल में प्रकाशित किया गया। परीक्षण रिपोर्ट के मुताबिक, कुएं में जिन सैनिकों के नरकंकाल मिले हैं, वो ब्रिटिश इंडियन आर्मी की 26वीं बंगाल इनफैंट्री का हिस्सा थे।पुरातत्वविदों ने अजनाला के कुएं को ऐसी जगह बताया है, जहां 1857 के विद्रोह से जुड़े सबसे अधिक नरकंकाल पाए गए हैं।

ब्रिटिश अधिकारी की किताब में जिक्र

 

कुंए के पास इकट्‌ठा जनसमूह

रिपोर्ट के मुताबिक अजनाला के इस कुएं का जिक्र 1857 के विद्रोह के दौरान अमृतसर में डिप्टी कमिश्नर के तौर पर तैनात एक ब्रिटिश अधिकारी की लिखी किताब में मिला है। जिसमें लिखा हुआ है कि लाहौर स्थित मियां मीर कैंटोनमेंट के सिपाही गाय और सुअर की चर्बी वाले कारतूसों का विरोध कर रहे थे। इसके चलते उन्होंने कुछ ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या कर दी। फिर कुछ पंजाब की तरफ भाग निकले। उन्हें पकड़ लिया गया और अजनाला के पास मार दिया गया। किताब के मुताबिक, अजनाला के पास लगभग 282 भारतीय सैनिकों की हत्या कर दी गई। हालांकि अब इसे 246 बताया जा रहा है।
किताब में आगे लिखा है कि क्योंकि बड़े स्तर पर की गई इन हत्याओं की जानकारी बाहर जाने से और अधिक विद्रोह भड़कने की आशंका थी, इसलिए अधिकारियों ने शवों को तुरंत कुएं में फेंक दिया। इतिहास की किताबों में इस घटना का उतना जिक्र नहीं होता, जितना कि जलियांवाला बाग हत्याकांड का जिक्र होता है। कई इतिहासकार ये भी मानते हैं कि अजनाला कुएं में मिले नरकंकाल उन लोगों के हैं, जिनकी हत्या विभाजन के दौरान हुई सांप्रदायिक हिंसा में हुई।

दांतों के परीक्षण से सामने आई कई जरूरी बातें

रिपोर्ट के मुताबिक साल 2014 में कुछ कम अनुभवी पुरातत्वविदों ने अवैज्ञानिक तरीके से इस कुएं से कुछ नरकंकाल निकाल लिए। जिसके बाद सरकार ने पंजाब यूनिवर्सिटी के एंथ्रोपॉलिजिस्ट जे एस सेहरावत के नेतृत्व में वैज्ञानिक तरीके से जांच करने के लिए एक ग्रुप का गठन किया। इस ग्रुप ने कंकालों के कई हिस्सों का वैज्ञानिक परीक्षण किया. मसलन, दांत, जबड़े के हिस्सों, मेरुदण्ड, खोपड़ी, हाथ और पैर की उंगलियों, पैरों की हडि्डयों, गर्दन की हडि्डयों और हाथ की हड्डियों का परीक्षण किया गया। साथ ही साथ इन नरकंकालों के साथ कुछ पुराने सिक्के, जेवर और मेडल भी मिले। इस कुएं से दांतों के कुल 9,646 नमूने मिले। यह अब तक किसी पुरातात्विक स्थल में पाए गए सबसे बड़ी तादाद में दांतों के नमूने है। अबतक चार हजार नमूनों का विश्लेषण किया जा चुका है।

हत्या से पहले की थी क्रूरता

रिपोर्ट के मुताबिक, अच्छी क्वालिटी के 50 दांतों के नमूने की डीएनए जांच की गई। इसके साथ 85 दांतों के नमूनों का ऑक्सीजन आइसोटोप विश्लेषण हुआ। अध्ययन करने वालों ने बताया कि दातों में खाने के जो नमूने पाए गए, उससे पता चला कि हत्या करने के बाद कुएं में जिन लोगों को फेंका गया वो गंगा के मैदानी इलाकों से संबंध रखते थे। खासकर, उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल से। इससे पहले माना जा रहा था कि कुएं में पाए गए नरकंकाल पाकिस्तान के पंजाब में रहने वालों के थे।
इन कंकालों के विश्लेषण पर जे एस सेहरावत ने कई जरूरी बातें बताईं। उन्होंने बताया कि ट्रेस एलिमेंट्स और डीएनए एनालिसिस के आधार पर पता चला है कि जिन सैनिकों को मारा गया, उनकी उम्र 21 साल से 49 साल के बीच थी। उन्होंने आगे बताया, “डेंटल पैथालॉजी एनालिसिस के आधार पर पता चला कि मारे गए सैनिक पूरी तरह स्वस्थ्य थे और शायद इसलिए ही सेना में थे। आर्मी में होने की वजह से उनके पास अच्छी सेहत बनाए रखने की सुविधाएं उपलब्ध थीं।”
विश्लेषण में ये भी सामने आया कि इन सैनिकों को बहुत ही क्रूरता से मारा गया। अध्य्यन करने वालों को 86 खोपड़ियों में दोनों भौंहों के बीच चोट के निशान मिले हैं। जिससे पता चलता है कि उन्हें प्वाइंट ब्लैंक रेंज से गोली मारी गई। साथ ही साथ कंकालों के साथ पत्थर की गोलियां भी मिली हैं, जिनका इस्तेमाल 19वीं शताब्दी में कैद किए गए लोगों की हत्या में होता था। कूल्हे की हड्डियां भी टूटी पाई गई हैं। जिससे पता चलता है कि गोली मारने से पहले सैनिकों को प्रताड़ित किया गया। साथ ही साथ मृत सैनिकों को दफनाने की जगह सीधे ऊपर से कुएं में फेंक दिया गया। इस कुएं से कंकालों के अलावा जेवरात, मेडल और सिक्के भी मिले हैं। कुछ सिक्कों के ऊपर रानी विक्टोरिया के चित्र मिले हैं।

दुनिया का क्रूरतम हत्याकांड

पंजाब विश्वविद्यालय के एंथ्रोपोलॉजी विभाग के डॉ. जेएस सहरावत और दीक्षा सांख्यान ने अपने इस अध्ययन से दुनिया के दस जघन्य अपराधों को सामने रखा। यह अपराध सर्बिया, रवांडा, साइप्रस, पेरू, स्पेन, इराक, ग्वाटेमाला आदि देशों के थे। इन देशों में क्रांति व दंगों के जरिए लोगों को मारा भी गया और मरवाया भी गया लेकिन मारे गए लोगों की बाकायदा कब्रें खोदी गईं और उन्हें दफनाया गया।
इन देशों की संस्थाओं व कुछ सरकारों ने इन कब्रों को फिर से खोदा और पूरे कंकाल बरामद किए। एंथ्रोपोलॉजिस्ट के जरिए यह पूरा कार्य करवाया गया, जिन पर शोध चल रहे हैं। टीम ने अध्ययन के बाद पाया कि दुनिया भर में जगह-जगह भले ही लोगों को मारा गया हो लेकिन उनका अंतिम संस्कार किया गया लेकिन 1857 की क्रांति में सैनिकों को मारकर अमृतसर के अजनाला स्थित एक कुएं में डाल दिया गया।
इन सैनिकों को कूड़े की तरह समझा गया। इनका अंतिम संस्कार तक नहीं किया गया, जो मानवाधिकार की श्रेणी में आता है। यही नहीं देश में इतनी बड़ी संख्या में एक जगह से कंकालों का मिलना भी अपने आप में पहली घटना है।

नायक थे आलम बेग, उड़ा दिया था तोप से सिर

रिपोर्ट के मुताबिक 1857 की क्रांति में अंग्रेजों ने 282 सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था। मारने से पहले सभी को गोला बनाकर खड़ा किया गया और सिर में गोली मारी गई। इनके नायक आलम बेग का सिर तो तोप से उड़ाया गया और उस सिर को रानी विक्टोरिया को भेंट किया गया। मारे गए सभी सैनिकों के शवों को अमृतसर के अजनाला स्थित एक कुएं में डाल दिया गया। ब्रिटिश कमिश्नर हेनरी कूपर की किताब जब यहां के लोगों को हाथ लगी तो अजनाला का कुआं वर्ष 2014 में खुदवाया गया, जिसमें से इन सैनिकों के कंकाल बरामद हुए।

छत्तीसगढ़ में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाने वाले आदिवासी को डाल दिया था खौलते तेल में, 109 साल बाद मिली सद्गति


छत्तीसगढ़ में भी अंग्रेजी राज की एक खौफनाक दास्तान इस साल फरवरी 2022 में सामने आई। दरअसल यहां बलरामपुर जिले में एक नर कंकाल 109 साल से एक स्कूल में रखा हुआ था। खबरों के मुताबिक यह कंकाल अंग्रेजों से लोहा लेने वाले लागुड़ नगेसिया का था। इस साल शुक्रवार 4 फरवरी को सामरी में विधि विधान से अंतिम संस्कार कर दिया गया। खबर के मुताबिक ब्रिटिशकाल के दौरान 1913 में लागुड़ नगेशिया के साथ बीगुड को अंग्रेजों ने मृत्युदंड दिया था। उसे खौलते तेल में डाल दिया गया था।
अब तक लागुड नगेशिया का कंकाल अंबिकापुर के मल्टीपरपज स्कूल में रखा गया था।पूर्ववर्ती भाजपा शासनकाल से लागुड नगेशिया की अस्थियों को देने की मांग समाज के लोगों द्वारा की जा रही थी।स्वजन भी इसके लिए प्रयासरत थे।कुछ महीने पहले क्षेत्रीय विधायक व संसदीय सचिव चिंतामणि महाराज ने सरगुजा कलेक्टर से समाज के लोगों के साथ मुलाकात की थी।
बाद में लागुड नगेशिया की अस्थियों को देने के संबंध में मांग कलेक्टर बलरामपुर से किए जाने पर उन्होंने सरगुजा कलेक्टर को पत्र लिखा था क्योंकि लागुड नगेशिया की अस्थियां सरगुजा जिला मुख्यालय अंबिकापुर के मल्टीपरपज स्कूल में विज्ञान के छात्रों की पढ़ाई के लिए रखी गई थी।
दो-तीन दिन पहले राज्य सरकार की पहल पर अस्थियों को ससम्मान स्वजन को सौंपा गया।इसी के बाद शुक्रवार 4 फरवरी को सामरी में विधि विधान से अंतिम संस्कार किया गया।बड़ी संख्या में नगेशिया समाज के लोग व जनप्रतिनिधि भी सामरी पहुंचे थे।अब लागुड नगेशिया को शहीद का दर्जा व उनकी याद में स्मारक बनाए जाने की मांग उठने लगी है।

ऐसा है इतिहास लागुड़ नगेसिया का


बलरामपुर जिला स्थित कुसमी ब्लाक के राजेंद्रपुर निवासी लागुड नगेसिया पुंदाग गांव में घर-जमाई रहता था। इसी दौरान उसका झुकाव ब्रिटिश शासन के खिलाफ चल रहे ताना भगत नामक आंदोलन से हुआ था।उनके साथ बिगू बनिया (बिगुड़) और कटाईपारा जमीरपाट निवासी थिथिर उरांव भी ताना भगत आंदोलन में शामिल हो गए थे। उन्होंने अंग्रेजों के लिए काम करने वालों को मार डाला था जो बातें निकलकर सामने आती है उसके मुताबिक इसके बाद 1912-13 में थीथिर उरांव को घुड़सवारी दल ब्रिटिश आर्मी ने मार डाला था और लागुड व बिगुड़ को पकड़कर ले गए।कहा जाता है कि उसके बाद दोनों को खौलते तेल में डालकर मार डाला गया। इनमें से एक लागुड़ के कंकाल को तब के एडवर्ड स्कूल और वर्तमान के मल्टी परपज स्कूल में विज्ञान के स्टूडेंट को पढ़ाने के नाम पर रख दिया गया था। लागुड़ बिगुड़ की कहानी सरगुजा क्षेत्र में लागुड़ किसान और बिगुड़ बनिया के रूप में आज भी प्रसिद्ध है।

लागुड के बेटी-दामाद की साल
भर पहले हो चुकी है मौत

लागुड की नातिन मुन्नी नगेसिया चरहट कला ग्राम पंचायत में रहती है।मुन्नी की मां ललकी, लागुड़ की बेटी थी।ललकी की शादी कंदू राम से हुई थी।एक साल पहले ललकी और कंदू की मौत हुई। चरहट कला के सरपंच मनप्यारी भगत के पति जतरू भगत बताते हैं कि लागुड़ का दामाद कंदू हमेशा गांव में अपने ससुर की कहानी सुनाता था और कहता था कि गांव में उनकी मूर्ति स्थापना करनी चाहिए, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो सका है।
सर्व आदिवासी समाज के लोग कंकाल का डीएनए टेस्ट कराने की मांग कर रहें थे। वे इसके लिए भाजपा की रमन सरकार के समय मांग कर चुके हैं, लेकिन इस पर सरकार ने कोई पहल नहीं की थी। वहीं 1982 में संत गहिरा गुरु ने लागुड़ की आत्मा की शांति के लिए प्रतीकात्मक रूप से रीति रिवाज से कार्यक्रम कराया गया था।वहीं 25 जनवरी को सर्व आदिवासी समाज के लोगों ने कलेक्टर से लागुड़ के कंकाल को उनके परिजन को दिलाने मांग की थी।