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सुपरस्टार बाल कलाकार से श्रीदेवी की ‘आवाज’ तक पहचान रही बेबी नाज

कभी सर्वाधिक पारिश्रमिक लेने वाली बाल कलाकार रही

नाज, बाद के दिनों में डबिंग आर्टिस्ट के तौर पर धूम मचाई

मुंबई। अपने दौर की सर्वाधिक व्यस्ततम और सबसे ज्यादा पारिश्रमिक लेने वाली बाल कलाकार बेबी नाज ने बचपन में ही स्टारडम देख लिया था। अपनी प्रतिभा के दम पर नाज ने ऐसी धाक जमाई की उन्हें कान फिल्म फेस्टिवल में भी सम्मानित किया गया।

 

हालांकि एक सफल बाल कलाकार होने के बावजूद फिल्मों में सफल हीरोईन कभी नहीं बन सकी। जीवन के उत्तरार्ध में नाज का करियर फिर एक बार चमका लेकिन इस बार परदे के पीछे से। 90 के दौर में नाज एक सफल डबिंग आर्टिस्ट रहीं और श्रीदेवी की तमाम हिंदी फिल्मों में उन्होंने अपनी आवाज दी। नाज ने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे और एक दिन पेट के कैंसर से जूझते हुए उनकी मौत हो गई।

संघर्षरत लेखक पिता ने आर्थिक तंगी के चलते भेजा फिल्मों में

कुमारी नाज़़ या बेबी नाज़ का मूल नाम सलमा बेग था। 20 अगस्त 1944 को जन्मीं नाज सबसे पहले छह साल की उम्र में सन 1950 में फिल्म ‘रूपैया’ 1950 में परदे पर बाल कलाकार के रूप में दिखाइ दी थी।

इस फिल्म में शशिकला, ओम प्रकाश और मनमोहन भी थे। फिल्म के निर्देशक जीपी पवार और संगीतकार पी. रमाकांत थे। इसके बाद महज 8 साल की उम्र में उन्होंने फिल्म ‘रेशम’ में अभिनेत्री सुरैया के बचपन का रोल किया था।

सलमा के पिता मिर्जा दाऊद बेग एक लेखक थे, जो संघर्ष करते रहे। पिता के दोस्त प्रोड्यूसर लेखराज ने पहली बार सलमा को फिल्म में काम करने का मौका दिया था। हालांकि पहले पिता नहीं चाहते थे कि वह फिल्मों में काम करें, लेकिन आर्थिक तंगी की वजह से वह सलमा के काम करने के लिए तैयार हो गए।

‘बूट पॉलिश’ ने शिखर पर स्थापित किया, नंदा की जगह मिली थी भूमिका

नरगिस और राज कपूर के साथ बूट-पालिश फिल्म की एक पार्टी में नाज

एक बाल कलाकार के रूप में उनकी सबसे यादगार भूमिका आरके फिल्म्स की बूट पॉलिश (1954) और बिमल रॉय की देवदास (1955) में थी। उन्होंने 1955 में कान्स फिल्म फेस्टिवल में फिल्म ‘बूट पॉलिश’ में अपने अभिनय के लिए प्रशंसा बटोरी।

यहां उन्हें सह-अभिनेता रतन कुमार के साथ सम्मानित किया गया। इस फिल्म को कान फिल्म्स फेस्टिवल में प्रतियोगिता वर्ग में प्रदर्शित किया गया था।

बूट पालिश में मास्टर रतन कुमार के साथ बेबी नाज

‘बूट पॉलिश’ के साथ खास बात यह थी कि शुरू में ‘बेला’ की भूमिका के लिए राजकपूर ने नंदा को लेने सोचा था मगर स्क्रीन टेस्ट के बाद उनको महसूस हुआ कि फिल्म के रोल के लिए वह बड़ी लगती है।

इसके बाद तलाश शुरू हुई बाल कलाकार की। मुंबई के 12 स्कूल्स में खोजबीन करने के बाद राज कपूर ने ‘बेला’ की भूमिका के लिए बेबी नाज और बड़े भाई ‘भोला’ की भूमिका के लिए रतनकुमार को चुना।

 मुख्य किरदार के लिए तरस गईं, मिलती रहीं सहायक भूमिकाएं

वहीदा रहमान और सुनील दत्त के साथ बेबी नाज

1958 में बेबी नाज की फिल्म ‘दो फूल’ आई। 1960 में बनी फिल्म ‘लंबे हाथ’ में उन्हें महमूद के साथ देखा गया। जिसके डायरेक्टर जीपी सिप्पी थे। बाद के दौर में उम्र बढ़ने के साथ-साथ उन्हें सहायक अभिनेत्री की भूमिकाएं मिलने लगी। जिसमें उनकी उल्लेखनीय फिल्में ‘बहू बेगम’, ‘कटी पतंग’ और ‘सच्चा-झूठा’ रही।

खास तौर पर ‘सच्चा-झूठा’ फिल्म का उल्लेख इसलिए कि इसमें उन्होंने उन्होंने राजेश खन्ना की शारीरिक रूप से विकलांग बहन की भूमिका निभाई थी। जिसे लोकप्रिय गीत ”मेरी प्यारी बहनिया बनेगी दुल्हनियां” में देखा जा सकता है।

नाज और सुब्बीराज की मुलाकात बदल गई प्यार में

पति सुब्बीराज और बच्चों के साथ नाज

सुब्बीराज और नाज के मिलने का किस्सा भी रोचक है। वाकया साल 1963 में रिलीज हुई फिल्म ‘देखा प्यार तुम्हारा’ की शूटिंग के दौरान का है। डायरेक्टर के. परवेज के निर्देशन बनी इस फिल्म के हीरो थे अपने समय के प्रसिद्ध अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के भांजे सुब्बीराज।

सुब्बीराज को फिल्मों में अधिक्तर पुलिस ऑफिसर से लेकर बिजनेसमैन की भुमिका में देखा जाता था। वहीं फिल्म की हीरोइन थीं नाज़। फिल्म ‘देखा प्यार तुम्हारा’ की शूटिंग प्रतापगढ़ के एक किले में चल रही थी। सुब्बीराज और बेबी नाज़ काफी घुल-मिलने लगे थे। धीरे-धीरे यह मुलाकात प्यार में बदल गई।

सुब्बीराज से हुआ विवाह, साधना के माता पिता ने किया था कन्यादान

उन्होंने 1965 में नाज ने अभिनेता सुब्बीराज से शादी की और काम करना जारी रखा। दोनों ने मेरा घर मेरे बच्चे (1960) और देखा प्यार तुम्हारा (1963) में साथ-साथ काम किया था। अलग-अलग धर्म के होने की वजह से नाज और सुब्बीराज की शादी भी उन दिनों में एक बड़ा मुद्दा थी।

तब नाज ने धर्म परिवर्तन करके अपना नाम अनुराधा रख लिया था। नाज के माता पिता को इस शादी से कोई ऐतराज नहीं था फिर भी अभिनेत्री साधना के माता पिता ने नाज को दत्तक पुत्री बनाकर उसका कन्या दान किया था।

बाद के दौर में नाज को फिल्मों में मुख्य हीरोईन की भूमिकाएं नहीं मिली और अन्य भूमिकाओं के लिए भी फिल्में कम मिलने लगीं। ऐसे में नाज अपनी घर-गृहस्थी में व्यस्त होने लगी।

डबिंग आर्टिस्ट के तौर पर व्यस्त रहीं, श्रीदेवी की आवाज बन गईं

सच्चा-झूठा में राजेश खन्ना के साथ नाज

फिर 90 का दौर आया जब दक्षिण की फिल्मों और वहां की नायिकाओं की धूम मच गई। इनमें सबसे उल्लेखनीय नाम श्रीदेवी का था। तब श्रीदेवी ठीक से हिंदी नहीं बोल सकती थी, इसलिए श्रीदेवी की शुरूआती दौर की तमाम फिल्मों में हिंदी डबिंग बेबी नाज ने की। देखते ही देखते नाज एक सफल डबिंग आर्टिस्ट बन गई और उन्हें श्रीदेवी की आवाज भी कहा जाने लगा।

उन्होंने कल्याण जी आनंदजी के शो सहित कई हस्तियों के शो का संचालन करना शुरू किया। वहीं फिल्मों में अभिनय भी करती रही। उस दौर में तब नाज ने ‘फुलवारी’,’शीशा’ और ‘बाक्सर’ जैसी फिल्मों में काम भी किया। 1989 में आखिरी बार उन्हें ‘प्यासे नैन’ देखा गया था। फिर उन्हें पेट का कैंसर हो गया और इसी बीमारी से जूझते हुए 19 अक्टूबर, 1995 को उन्होंने आखिरी सांस ली।