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सेल-भेल सहित कई सार्वजनिक उपक्रमों को मजबूती देने से तिहाड़ की जेलयात्रा तक चर्चित रहे कृष्णमूर्ति

सार्वजनिक उपक्रमों की कायापलट करने वाले कृष्णमूर्ति

नहीं रहे, सेल में एक झटके में बंद कर दिया था ओवरटाइम

मुहम्मद जाकिर हुसैन

सरकारी कंपनियों को ”बदनुमा दाग” साबित करने और अंधाधुंध निजीकरण के दौर में सार्वजनिक उपक्रमों की कायापलट करने वाले वेंकटरमण कृष्णमूर्ति (V.Krishnamurthy) का जाना एक बड़ी रिक्तता का सूचक है। उन्हें भारत में सार्वजनिक उपक्रमों का ‘पिता’ कहा जाता था।

26 जून को चेन्नई में 97 साल की उम्र पूरी कर कृष्णमूर्ति ने आखिरी सांस ली। उन्हें तीनों प्रमुख सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिले। जिसमें 1973 में पद्मश्री, 1986 में पद्मभूषण और 2007 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया था।

कृष्णमूर्ति देश के वरिष्ठ नौकरशाह थे। उन्होंने स्टील अथारिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल), भारत हैवी इलेक्ट्रिकल लिमिडेट (भेल), मारूति इंडिया लिमिटेड और गैस अथारिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (गेल) जैसी कंपनियों की बागडोर उन्होंने अलग-अलग समय में संभाली और इन्हें नई ऊंचाईयां दी।

वह कृष्णमूर्ति ही थे, जिन्होंने बता दिया कि सरकारी उपक्रम भी बेहतर परफार्म कर सकते हैं बशर्ते वहां मैनेजमेंट सही हो और सही फैसले सही वक्त पर लिए जाएं। कृष्णमूर्ति का करियर जहां ढेर सारी उपलब्धियों से भरा हुआ था वहीं सीबीआई जांच और तिहाड़ जेल की यात्रा जैसे बदनुमादाग भी उनके सीवी में शामिल थे।

राहुल ने बताया सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का अगुआ

कृष्णमूर्ति के निधन पर सांसद व वरिष्ठ कांग्रेस नेता राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ने शोक व्यक्त करते हुए कहा कि वह सच्चे मायने में राष्ट्र निर्माता थे। गांधी ने ट्वीट किया, ‘‘पद्म विभूषण डॉ. वी. कृष्णमूर्ति के निधन से बहुत दुखी हूं जो भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के अगुआ थे।

’’कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष गांधी ने कहा कि कृष्णमूर्ति सच्चे मायने में राष्ट्र निर्माता थे और भेल, मारुति तथा सेल के जरिए उनकी महान विरासत अमर रहेगी। गांधी ने कहा, ‘‘उनके परिवार एवं मित्रों के प्रति मेरी संवेदनाएं।’’ कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश ने भी ट्वीट करके कृष्णमूर्ति के निधन पर शोक जताया।

नेहरू से मनमोहन सिंह तक के साथ निभाई जवाबदारियां

कृष्णमूर्ति संभवत: ऐसे अकेले नौकरशाह (टेक्नोक्रैट) थे, जिन्होंने आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू से लेकर डॉ. मनमोहन सिंह तक के तमाम प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई। कृष्णमूर्ति की अहमियत इसी से समझी जा सकती है कि अपनी उम्र के 9 वें दशक तक वह कांग्रेस सरकारों में बहुत सी जवाबदारियां निभाते रहे।

यूपीए के पहले कार्यकाल (2004-09) में वह सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय एकता परिषद के सदस्य थे। वहीं दूसरे कार्यकाल (2009-14) में उन्हें कैबिनेट मंत्री के दर्जे के साथ राष्ट्रीय विनिर्माण प्रतिस्पर्धात्मकता परिषद (एनएमसीसी) National Manufacturing Competitiveness Council (NMCC) के चेयरमैन की जवाबदारी दी गई। वह राजीव गांधी फाउंडेशन के संस्थापक ट्रस्टी भी थे।

सेल को पटरी पर लाने का श्रेय कृष्णमूर्ति को

1985 में जब उन्होंने सेल चेयरमैन की बागडोर संभाली तो भिलाई सहित सभी इकाईयों में तीसरे दौर का विस्तारीकरण चल रहा था। तब उन्होंने कुछ बड़े और कड़े कदम उठाए थे, जिसकी चर्चा आज भी होती है। उनके इन फैसलों से सेल की व्यवस्था पटरी पर आई।

मसलन, तब तक समूचे सेल में सरकारी कर्मियों की भर्राशाही पूरे चरम पर थी। मिलीभगत से ड्यूटी के वक्त टाइम पास और फिर ड्यूटी के बाद ओवरटाईम (ओटी) overtime OT बनवाना तब का दस्तूर बन चुका था।

एक झटके में किया ओवरटाइम बंद

इससे कंपनी पर अनावश्यक वित्तीय बोझ बढ़ रहा था। कृष्णमूर्ति ने इसकी समीक्षा की एक झटके में समूचे सेल में ओवर टाइम बंद कर दिया। स्वाभाविक है, हड़कंप मचा, आंदोलन हुए। एनजेसीएस की सहमति के बिना फैसला लेने पर श्रमिक संगठनों ने भी आड़े हाथों लिया।

इन सबके बावजूद कृष्णमूर्ति अपने फैसले पर अडिग रहे। सेल की भिलाई,राउरकेला, बोकारो, दुर्गापुर सहित तमाम इकाईयों में यह फैसला पूरी सख्ती से लागू किया गया और इसका बेहतर नतीजा भी सामने आया।

भिलाई डूब रहा था, तुरंत उठाया बड़ा कदम

कृष्णमूर्ति का दूसरा बड़ा कदम भिलाई (Bhilai)के हित में था। तब भिलाई में 40 लाख टन विस्तारीकरण का दौर चल रहा था। नई प्लेट मिल आ चुकी थी लेकिन ब्लास्ट फर्नेस-7 जैसी बड़ी यूनिट की स्थापना में गतिरोध आ रहा था। वहीं उत्पादन भी पटरी पर नहीं था।

इस बीच 1986 मे कोक ओवन ब्लास्ट का हादसा हो गया जिसमें 9 कर्मियों की मौत हुई और 30 से ज्यादा झुलस गए। मामला संसद तक में उठा। इन सारे गतिरोध के बीच उस वक्त के मैनेजिंग डायरेक्टर परिस्थितियों से निपटने में नाकाबिल साबित हो रहे थे।

उनका ध्यान कला-संस्कृति पर ज्यादा था। सेल चेयरमैन होने के नाते कृष्णमूर्ति इन सारे हालात से वाकिफ थे और दिल्ली तक भिलाई की बड़ी नेगेटिव रिपोर्ट जा रही थी। ऐसे में एक रोज अचानक कृष्णामूर्ति ने अनूठा फैसला लिया।

सेल छोड़ चुके शेखर को सौंपी भिलाई की बागडोर

तब भिलाई स्टील प्लांट में एक दफा मैनेजिंग डायरेक्टर रहे ईआरसी शेखर नाईजीरिया में भारत के सहयोग से बनने वाले अजाउकुटा स्टील प्लांट के प्रोजेक्ट से लौट चुके थे और लगभग निर्वासित इंजीनियर का जीवन जी रहे थे।

शेखर तब सेल छोड़ चुके थे औऱ भंडारा के पास अपने दौर के कुछ उच्च पदस्थ इंजीनियरों को लेकर सनफ्लैग स्टील प्लांट स्थापना की तैयारी कर रहे थे। ऐसे में शेखर दिल्ली में थे और अक्सर रविवार के रोज कृष्णमूर्ति के घर चाय पर जाया करते थे।

ऐसे ही एक रोज चाय पर कृष्णमूर्ति ने शेखर से भिलाई के हालात पर चर्चा की और सेल के वाइस चेयरमैन के पद के साथ सीधे भिलाई स्टील प्लांट (‌Bhilai Steel Plant)  में मैनेजिंग डायरेक्टर पद पर ज्वाइन करने का ऑफर दे दिया।

शेखर ने ना तो नहीं कहा लेकिन कुछ वक्त मांगा। इस बीच कृष्णमूर्ति ने इंतजार नहीं किया। भिलाई के मैनेजिंग डायरेक्टर को तुरंत रांची भेजा और वहां अगली व्यवस्था तक के लिए सेल के तत्कालीन वाइस चेयरमैन शिवराज जैन को भिलाई का कार्यवाहक एमडी बना कर भेजा।

इस बीच शेखर भी सहमत हो गए और 15 दिन बाद शेखर ने दूसरी बार भिलाई के एमडी की जिम्मेदारी संभाल ली। कृष्णमूर्ति का यह फैसला भिलाई के हितकारी साबित हुआ और शेखर के मार्गदर्शन में भिलाई की 40 लाख टन परियोजना पूरी हुई।

कृष्णमूर्ति के करियर पर दाग भी लगा, जाना पड़ा था जेल

लेकिन कृष्णमूर्ति का करियर पूरी तरह ‘उजाले’ से भरपूर नहीं रहा। उन्हें विवादों का भी सामना करना पड़ा और इसके लिए डेढ़ महीने से ज्यादा तिहाड़ जेल में गुजरे। 1992 के दौर में जब हर्षद मेहता वाला बहुचर्चित प्रतिभूति घोटाला सामने आया तो कृष्णमूर्ति को दलालों, बैंकरों और राजनेताओं के बीच एक कड़ी प्रचारित किया गया।

इसमें उनकी गिरफ्तारी हुई और फिर जेल भी। हालांकि उनकी गिरफ्तारी के 18 महीने बाद, संयुक्त संसदीय समिति की अंतिम रिपोर्ट में घोटाले में उनकी भूमिका का कोई उल्लेख नहीं था।

प्रतिभूति घोटाले में था नाम, बेटे के साथ हुई थी गिरफ्तारी

दरअसल, अप्रैल 1992 में जब प्रतिभूति घोटाला सामने आया तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने जांच शुरू की। तब शीर्ष दलालों को गिरफ्तार किया गया। वहीं पूर्व वाणिज्य राज्य मंत्री पी. चिदंबरम को इस्तीफा देने के लिए कहा गया, क्योंकि उनका नाम केनरा बैंक के पूर्व अध्यक्ष बी. रत्नाकर के फेयरग्रोथ ग्रुप ऑफ कंपनीज से जुड़ा था।

वहीं शेयरधारकों की सूची में वी. कृष्णमूर्ति का नाम भी आया। तब शेयर दलाल हर्षद मेहता के रिकॉर्ड में एक कंपनी के.जे. इन्वेस्टमेंट्स थी, जिसमें कृष्णमूर्ति के बेटे के. जयकर प्रमोटर-निदेशक थे। तब सीबीआई ने एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए कृष्णमूर्ति और उनके बेटे चंद्रा को गिरफ्तार किया था। चंद्रा एक अमेरिकी नागरिक जो उस समय भारत में थे।