छत्तीसगढ़ के जन-जन के होठों पर बसे हैं
लक्ष्मण के गीत, आज जयंती पर विशेष
अरूण कुमार निगम
छत्तीसगढ़ी साहित्य और कला जगत में लक्ष्मण मस्तुरिया बड़ा नाम थे। उनका जन्म 07 जून 1949 को बिलासपुर के मस्तुरी में हुआ था। उनकी प्रमुख कृतियों में मोर संग चलव रे, हमू बेटा भुइंया के, गंवई-गंगा, धुनही बंसुरिया, माटी कहे कुम्हार से, सिर्फ सत्य के लिए आदि हैं।
वे मूलतः गीतकार थे और उन्होंने मोर संग चलव रे, मैं छत्तीसगढ़िया अंब रे आदि लोकप्रिय गीतों की रचना की। इसमें से मोर संग चलव रे तो छत्तीसगढ़ के जन-जन के होठों पर बसा हुआ है।
आकाशवाणी, दूरदर्शन और कवि सम्मेलनों के मंच से होते हुए लक्ष्मण छत्तीसगढ़ी फिल्मों में भी गीत लिखते रहे। उनकी 77 छत्तीसगढ़ी कविताओं का संग्रह ‘मोर संग चलव’वर्ष 2003 में, 61 छत्तीसगढ़ी निबन्धों का संग्रह ‘माटी कहे कुम्हार से’ वर्ष 2008 में और इकहत्तर हिन्दी कविताओं का संकलन ‘सिर्फ सत्य के लिए‘भी वर्ष 2008 में प्रकाशित हुआ। इसके पहले छत्तीसगढ़ के क्रांतिकारी अमर शहीद वीर नारायण सिंह की जीवन-गाथा पर आधारित उनकी एक लम्बी कविता ‘सोनाखान के आगी‘ भी पुस्तक रूप में आ चुकी है।
वे मूलतः गीतकार थे। बघेरा के दाऊ रामचंद्र देशमुख के ‘चंदैनी गोंदा’ में गीत लिखकर स्थापित हुए। कुछ समय तक स्कूल में अध्यापन किया। वर्तमान में राजकुमार कॉलेज रायपुर में 1988 से अध्यापन का कार्य। छत्तीसगढ़ फिल्म मोर छुइंया भुइंया के लिए उन्होनें गीत लिखे। शनिवार 3 नवंबर 2018 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। वे पिछले कुछ दिनों से बीमार थे। सुबह सीने में दर्द की शिकायत के बाद उन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाया जा रहा था लेकिन रास्ते में ही उनकी सांसें रुक गईं।
लोक-कलाकारों और कवियों को एक छत के नीचे लाने पहल की

चंदैनी गोंदा के दौरान पीछे-ऊपर गिरिजाकुमार सिन्हा, नीचे बाएं से दाएं लक्ष्मण मस्तुरिया,रविशंकर शुक्ल,शैलजा ठाकुर,बाजू में चेहरे का हिस्सा संतोष कुमार टांक (बाँसुरी वादक),संगीता चौबे, संगीता की बेटी कविता,अनुराग ठाकुर, भैयालाल हेडाऊ,हारमोनियम पर खुमानलाल साव
लक्ष्मण मस्तुरिया 22 साल की उम्र में विख्यात कला मर्मज्ञ रामचंद्र देशमुख प्रसिद्ध सांस्कृतिक-संस्था ‘चंदैनी गोंदा ‘ के मुख्य गायक बन चुके थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक-पहचान को और आंचलिक-स्वाभिमान को देश और दुनिया के सामने लाने के लिए लोक-कलाकारों और कवियों को एक छत के नीचे लाने पहल की। छत्तीसगढ़ के खेत-खलिहान और मजदूर-किसान के जीवन-संघर्ष को गीतों भरी मार्मिक कहानी के रूप में, एक सुंदर और ह्रदय स्पर्शी गीत-नाट्य के रूप में प्रस्तुत करते हुए ‘चंदैनी गोंदा’ ने यहाँ की जनता के दिलों में बरसों-बरस राज किया।
नारायणलाल परमार ने ‘चंदैनी गोंदा’ पर अपने एक आलेख में इसके एक प्रस्तुतिकरण की उदघोषणा का सन्दर्भ देकर लिखा है कि यह प्रतीकात्मक रूप से कृषक -जीवन का ही चित्रण है। गेंदे के फूल दो प्रकार के होते हैं। बड़ा गोंदा सिर्फ श्रृंगार के काम आता है, जबकि छोटे आकार के गेंदे को छत्तीसगढ़ी में ‘चंदैनी गोंदा ‘ कहा जाता है, जो देवी की पूजा में अर्पित किया जाता है। देखा जाय तो गेंदे के फूलों का यह पौधा छत्तीसगढ़ के गाँवों में हर घर के आँगन की शान होता है।
तो इसी चंदैनी गोंदा को प्रतीक बना कर छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक जागरण की एक नयी यात्रा की शुरुआत हुई। जिसके सुंदर और मनभावन गीतों में से अनेक सुमधुर गीत अकेले लक्ष्मण मस्तुरिया ने लिखे थे।
छत्तीसगढ़ में बन गए आवाज की दुनिया के नायक

एक मंचीय प्रस्तुति के दौरान लक्ष्मंण मस्तुरिया व अन्य
सांस्कृतिक जागरण के इस मंच ‘चंदैनी गोंदा ‘ ने कवि लक्ष्मण मस्तुरिया को माटी की महक और मानवीय संवेदनाओं से भरपूर उनके गीतों के ज़रिए उन्हें छत्तीसगढ़ में आवाज की दुनिया का नायक भी बना दिया। धरती की धड़कनों से जुड़े उनके इन छत्तीसगढ़ी गानों को जनता ने हाथों -हाथ लिया। उनका गीत आज भी छत्तीसगढ़ की माटी में रचे-बसे हर इंसान को सामूहिकता की भावना में बाँध लेता है और लोग इन पंक्तियों को अनायास गुनगुनाने लगते हैं –
मोर संग चलव रे, मोर संग चलव जी ,
ओ गिरे -थके हपटे मन, अऊ परे-डरे मनखे मन ,
मोर संग चलव रे , मोर संग चलव जी .
अमरैया कस जुड छाँव म मोर संग बईठ जुडालव ,
पानी पी लव मै सागर अवं,दुःख-पीरा बिसरा लव .
नवा जोत लव, नवा गाँव बर, रस्ता नवां गढव रे!
लक्ष्मण का यह गीत वास्तव में समाज के गिरे-थके, ठोकर खाए , भयभीत लोगों को अपने साथ चलने, आम्र-कुञ्ज की छाँव में बैठ कर शीतलता का अहसास करने, अपनी भावनाओं के सागर से पानी पीकर दुःख-पीरा को भुला देने और एक नए गाँव के निर्माण के लिए आशा की नयी ज्योति लेकर नया रास्ता गढ़ने का आव्हान करता है।
लाल किले में भी किया कविता पाठ

लक्ष्मण मस्तुरिया, विजय दिल्लीवार व प्रमोद यादव आगरा 1977
लक्ष्मण छत्तीसगढ़ के उन गिने -चुने कवियों में हैं, जिन्हें नयी दिल्ली में गणतंत्र दिवस के राष्ट्रीय समारोह के मौके पर लाल किले के मंच से काव्य-पाठ करने का अवसर मिला है। लक्ष्मण को यह गौरव 1974 में छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध शायर मुकीम भारती के साथ मिल चुका था।
उनके गीतों पर आधारित सैकड़ों एलपी रिकार्ड्स, कैसेट्स और ऑडियो तथा वीडियो सी .डी .संगीत के बाज़ार में हाथों-हाथ लिए गए हैं। इसके पहले छत्तीसगढ़ के महान क्रांतिकारी अमर शहीद वीर नारायण सिंह की जीवन-गाथा पर आधारित उनकी एक लम्बी कविता ‘सोनाखान के आगी ‘ भी पुस्तक रूप में आ चुकी है।
गद्यकार के रूप में लक्ष्मण मस्तुरिया

लक्ष्मण मस्तुरिया और अरूण कुमार निगम
लक्ष्मण मस्तुरिया की गद्य रचनाओं में शोषण की पीड़ा और शोषकों के प्रति विद्रोह स्पष्ट दिखाई देता है। ऐसा महसूस होता है कि उनका शब्द-शब्द क्रांति का बिगुल फूँक रहा है। उनकी कलम में छत्तीसगढ़ बोलता है, सिसकता है, कराहता है तो हुंकार भी भरता है। उनके गद्य में उनकी कविताओं की तरह ही रसानुभूति भी देखने को मिलती है। इस संग्रह की विशेषता यह है कि किसी न किसी मुहावरे या लोकोक्ति को प्रत्येक रचना का शीर्षक बनाया गया है।
“माटी कहे कुम्हार से” किताब में संकलित रचनाओं के शीर्षक देखिए –
घर में अँजोर नहीं घोड़सार बर दिया, आँखी के अँधरा-नाम के नयनसुख, साझो के सुई सांगा म जाय, सोन म खोट हे तब सोनार के का दोष, बिनत रहिस सीला हपट पड़िस बीड़ा, तोड़ा न पैरी फुदक नाचै भैरी, तहूँ रानी महूँ रानी कोन देवै पानी, बोकरा के जीव जाय खवइया अलोवन, पेट के नाम जगजीता संझा खाये बिहिनिया रीता, सहर म दे दे बुलउवा राधे को, सहराय बहू डोम घर जाए, कथरी ओढ़ के घी खाय, खेलाय के नाम नहीं गिराय के गोहार, चेरी छोड़ न होवब रानी, राँड़ी दुख्हाई के झगरा गाँव के विनास, गुड़ खाय गुलगुला संग परहेज, बात के धनी करम के कँगला, आये नाग पूजे नहीं भिंभोरा पूजे जाय, खाय मुर्रा बताय बतासा, सिखायपूत दरबार नइ चढ़े, गली गली म साधू रेंज संत फुँकाओ कान चोला तरे के झन तरे नरियर धोती ले काम, अपने रतन गँवा के माँगत फिरे भीख, जनम के मुरहा करम के हीन जइसे तइसे काटे दिन, तेल न तेलइ बरा बरा नरियइ, सौ मत वाले हालै झूले बहुमत परे उदानी एक मत के कोलिहा बिचारा डगरे डहर परानी, फूँक फूँक के पाँव धरे अपने घर म बूड़ मरे, एक हाथ ले ताली नइ बाजय, जतके ओनहा ततके जाड़, नाँगर के न बक्खर के दौरी बर बजरंगा, जउन थारी म खाना उही म छेद करना, बिलाई ताके मुसवा छानी म सपट के, बोए बर बम्भरी आम खाये के साध रेंगइया बर का धूप का छाँव, जइसे खाये अन्न तइसे बने मन, कमाय निगोटी वाले खाय टोपी वाले, जर न ताप कीचक मरे आपेआप, घर म बल बताय खोर म पाँव परे, ओले आइन पोले गइन, निहानी के चोरी सुई के दान, कुकुर भूँके हजार हाथी चले बजार, पाँव बिन पनही के का मोल मनखे नइ रइहीं त लछमी ल कोन पूछही, टठिया न लोटिया फोकट के गौंटिया, बदना बदे नरियर फोर चढ़ावे बेल, मन के लड्डू खाय म पेट नइ भरै, जुच्छा गर ले घोंघी नीक, तिहार के ततेरा उजर गे बसेरा, एक ठन लइका गाँव भर टोनही, नौ हाथ लुगरा पहिरे तभो ले देह उघरा, बीमार हे बिलइया मुसवा टेंवे कान, अपन बोली अपन रुवाब पाँव म राख के मूड़ म खाप, मर मरे बरदवा बाँधे खाये तुरंग, नकटा के नाक कटे चार आँगुर बाढ़े, जरूरत ऊपर जुगति जुगाड़, मही माँगे जाय अउ ठेकवा लुकाय, बिच्छी के मंतर नइ जाने साँप के बिल म हाथ डारे, दहरा म मछरी भांठा म मोल, लागे भैंस के चस्का देहे न भावै गाय, रहे बर नांदगाँव बखाने बर बिरकोनी, कभू काल के खाइस पान दाँत निपोरिस गइस परान।
कवि के तौर पर देख रहे थे छत्तीसगढ़ का भविष्य

वरिष्ठ साहित्यकार सतीश जायसवाल, लक्ष्मण मस्तुरिया, आलोक पुतुल,अशोक शर्मा व अन्य
सच्चा कवि व साहित्यकार भविष्य को देख सकता है। अतः उन्होंने भविष्य को देखकर सही समय में चेतावनी भी दी है –
जनता के अधिकार के दुरुपयोग करइया नेता मंत्री मन अब सावधान होवै। अपन गलत काम अउ लोभ-लालच ल तियाग के जनता के दुख पीरा ल हरे के उपाय करै नइ तो समे के सूरज ह सबके गरियार ज्ञान बुद्धि ल जरो देही। अकाल दुकाल म अपन जीव बचाये बर मनखे जिनगी के आखरी लड़ाई म मरे-मारे बर उतर जाही तब जनता के उमड़े भीड़ ल कोनो फौज सिपाही नइ संभाल पाही। (गुनान गोठ – बंद हे गरीब के फाइल)
इन दोनों ही किताबों में ललित निबन्ध, विचारात्मक निबन्ध के साथ ही व्यंग्य की तीखी धार भी समाहित है। छत्तीसगढ़ी भाषा का ठेठ माधुर्य देखते ही बनता है। सत्य सदैव कटु प्रतीत होता है किंतु सत्य कहना भी जनहित में आवश्यक होता है। निर्भीक कलमकार ही सत्य को लिख पाता है।
आजकल सत्य में ही व्यंग्य के दर्शन हो जाते हैं। लक्ष्मण मस्तुरिया जी ने शालीनता के साथ सत्य को उजागर किया है। वे केवल राज्य की सीमा में ही बँध कर नहीं रहे बल्कि उन्होंने सम्पूर्ण देश के लिए चिंतन किया है। समस्याओं को रेखांकित करने के साथ-साथ समाधान के विकल्प भी सुझाये हैं। उनका लेखन हर युग में प्रासंगिक रहेगा। आज लक्ष्मण मस्तुरिया जी की तिहत्तरवीं जयंती पर उनकी चमत्कारी कलम को शत शत नमन।
मधुर छत्तीसगढ़ी गीतों का स्वर्णिम इतिहास,”मोर संग चलव……..”

“मोर संग चलव……..” इन तीन शब्दों के साथ ही कवि-गीतकार-गायक लक्ष्मण मस्तुरिया की साँवली-सलोनी सूरत आँखों के सामने झूलने लगती है। मैं सोचने लगता हूँ कि क्या यह सूरत केवल लक्ष्मण मस्तुरिया की है ? तो दिल से आवाज आती है – नहीं , यह सूरत तो मेरे छत्तीसगढ़ की है।
वही छत्तीसगढ़ जिसके दामन में खनिज, जल, वन-संपदा, वनोपज, अनाज, ऊर्जा, संस्कृति, साहित्य, संगीत और न जाने कितने अनमोल रत्नों का विपुल भंडार भरा है। हाँ-हाँ, वही छत्तीसगढ़ जिसने अपनी गोद में न जाने कितने अनजान अतिथियों को शरण दे दी, वही छत्तीसगढ़ जिसके शरणार्थी ही उसके मालिक बन बैठे।
बिल्कुल वही छत्तीसगढ़ जिसे उसके अपनों ने ही लूटा। जी हाँ ! वही छत्तीसगढ़ जिसके हिस्से में सदैव उपेक्षा के दंश आए फिर भी वह कहता रहा – “दया मया ले जा रे मोर गाँव ले। वही छत्तीसगढ़ जो अपना सर्वस्व लुटा कर भी गर्व से गाता रहा है – “मैं घर हारे जग जीता अंव”। मोर संग चलव रे, मोर संग चलव….
एक आह्वान है यह गीत जो सोयी हुई आत्मा को जगाता है
“मोर संग चलव” केवल गीत नहीं है, यह एक आह्वान है जो सोयी हुई आत्मा को जगाता है। यह गीत स्वाभिमान का रक्षा-कवच है। यह गीत छत्तीसगढ़ की अस्मिता का प्रतीक है। यह गीत गिरे-थके-परे-डरे लोगों की ओर सहारे के लिए बढ़ा हुआ हाथ है। यह गीत सर्वहारा वर्ग की सूनी आँखों में रंगीन स्वप्नों के बीज बोने का प्रयास है। यह गीत पृथक छत्तीसगढ़ राज्य के आंदोलन का प्रेरणा गीत है।
यह गीत दिल्ली के लाल किले की प्राचीर से गूँजती छत्तीसगढ़ी भाषा की बुलंदी है। और तो और यह गीत सियासी चुनावों का विजय-मंत्र है। चुनावी जीत के लिए “मोर संग चलव” का भरपूर प्रयोग किये और सत्ता पाते ही भूल गए। क्या लक्ष्मण मस्तुरिया को भूल गए ? नहीं, नहीं वे तो छत्तीसगढ़ को भूल गए। लक्ष्मण मस्तुरिया तो जनमानस के हृदय में बसेरा बना चुके हैं। छत्तीसगढ़िया-दिल की सत्ता पर उनका एक-छत्र राज्य है अउ यह राज्य हमेशा रहेगा। 20 जनवरी 1974 को दिल्ली के लाल किले से लक्ष्मण मस्तुरिया के स्वरों में छत्तीसगढ़ी भाषा बुलंद हुई थी एक आह्वान के साथ – “मोर संग चलव रे”। इस गीत ने चंदैनी गोंदा के मंच से जनमानस को उद्वेलित किया था।
फिल्म बनीं और सुरेश वाडकर ने गाया भी लेकिन पैदा नहीं हुई वह बात

फिल्म ‘मोर संग चलव’ का कैसेट कवर
“मोर संग चलव” शीर्षक से लक्ष्मण मस्तुरिया के गीतों का संग्रह प्रकाशित हुआ था। “मोर संग चलव” , जी हाँ ! इसी नाम से एक छत्तीसगढ़ी फ़िल्म भी बनी थी। कथा, संवाद और गीत लक्ष्मण मस्तुरिया के थे। निर्माता रमेश अग्रवाल और निर्देशक रवि चौधरी थे। इस फ़िल्म के गीतों को लक्ष्मण मस्तुरिया, अनुराधा पौड़वाल, अभिजीत, साधना सरगम, सुनील सोनी, अल्का चंद्रकार, पल्लवी, सुमन मिश्रा, सूरज और दिलीप षडंगी ने स्वरों से सजाया था।
“मोर संग चलव” का शीर्षक गीत सुप्रसिद्ध गायक सुरेश वाडकर ने बहुत की मधुर आवाज में गाया था लेकिन सुरेश वाडकर का गाया गीत, लक्ष्मण मस्तुरिया के गाए गीत पर छाने में असमर्थ रहा। छत्तीसगढ़ के श्रोताओं ने मोर संग चलव गीत को मस्तुरिया जी की आवाज में ही सुनना स्वीकार किया क्योंकि उनकी आवाज में छत्तीसगढ़ की माटी की सोंधी सुगंध समायी थी।
जब सात समंदर पार गूंज उठा “मोर संग चलव”

मस्तुरिया के गीतों का पहला एलपी-ईपी रिकार्ड
“मोर संग चलव” गीत ने वर्ष 1982 में छत्तीसगढ़ी गीत और संगीत को न केवल छत्तीसगढ़ के गाँव-गाँव तक पहुँचाने में क्रांतिकारी भूमिका निभायी बल्कि देश की सीमाओं से दूर सात समुन्दर पार तक पहुँचा दिया।आइए जानते हैं कि 1982 में ऐसी कौन सी क्रांति हुई थी जिसके कारण छत्तीसगढ़ी गीत और संगीत छत्तीसगढ़ के गाँव से लेकर सात समुन्दर पार तक गूँज उठा था।
दुर्ग निवासी ताज अली थारानी, जिनके परिवार की गाँधी चौक दुर्ग में एच एम वी, पॉलीडोर आदि रिकार्ड्स की डीलरशिप थी, “मोर संग चलव” गीत के दीवाने थे। उन्होंने लक्ष्मण मस्तुरिया से मुलाकात करके इस गीत के साथ ही कुछ और छत्तीसगढ़ी गीतों के रिकार्ड्स बनाने की इच्छा जाहिर की।
मस्तुरिया ने कहा कि विचार अच्छा है, मेरी सहमति भी है चलिए (मोर संग चलव) इस संदर्भ में चंदैनी गोंदा के संस्थापक दाऊ रामचंद्र देशमुख जी से चर्चा कर लेते हैं। लक्ष्मण मस्तुरिया के साथ थारानी , दाऊ रामचंद्र देशमुख के पास गए। उन्होंने भी प्रस्ताव पर अपनी सहमति प्रदान कर दी। इस तरह से पॉलीडोर जो म्यूज़िक इंडिया कंपनी बन चुकी थी, के स्टूडियो में लक्ष्मण मस्तुरिया के छत्तीसगढ़ी गीतों का पहला ई.पी. रिकॉर्ड तैयार हुआ।
तब जमाना था एलपी-ईपी रिकार्ड का
आप में से बहुत से मित्र जानते ही होंगे कि पहले 78 स्पीड के तवे (रिकार्ड) हुआ करते थे जिनके एक साइड में एक गीत और दूसरी साइड में एक गीत अर्थात एक रिकार्ड में कुल दो गीत हुआ करते थे। ग्रामोफोन चाबी वाला हुआ करता था और लोहे की नुकीली निडिल होती थी। बाद में इलेक्ट्रिक मोटर वाले रिकॉर्ड प्लेयर आ गए जिसमें क्वार्ट्ज़ की निडिल हुआ करती थी। इन रिकॉर्ड प्लेयर्स के साथ ही 45 आरपीएम स्पीड के ई पी रिकॉर्ड बनने लगे थे जिनके प्रत्येक साइड में दो गाने अर्थात एक रिकॉर्ड में कुल 4 गाने होते थे।
इससे बड़े आकार के रिकॉर्ड माने एल पी रिकॉर्ड भी बनने लगे थे जिनकी स्पीड 33 आरपीएम हुआ करती थी। एक एल पी रिकॉर्ड के प्रत्येक साइड में 6 गीत अर्थात कुल 12 गीत हुआ करते थे। सन् 1982 में इलेक्ट्रिक मोटर वाले रिकॉर्ड प्लेयर और ई पी, एल पी रिकार्ड्स (तवा) का प्रचलन हो चुका था। लक्ष्मण मस्तुरिया के गीत ई पी रिकार्ड्स में ही बने थे।
म्यूज़िक इंडिया कम्पनी द्वारा जारी, लक्ष्मण मस्तुरिया के छत्तीसगढ़ी गीतों का पहला रिकॉर्ड ई पी रिकॉर्ड था जिसके साइड A में “मोर संग चलव” और साइड B में दो गीत क्रमशः “पता दे जा रे, पता ले जा रे गाड़ी वाला” और “हम तोरे सँगवारी कबीरा हो, हम तोरे सँगवारी” था। मोर संग चलव गीत के गायक स्वयं लक्ष्मण मस्तुरिया थे। गीत लंबा होने के कारण साइड A में यही इकलौता गीत है।
साइड B के पहले गीत “पता दे जा रे, पता ले जा रे गाड़ी वाला” को गायिका कविता हिरकने (अब कविता वासनिक) ने स्वर दिया था। म्यूज़िक इंडिया कं. द्वारा यह रिकॉर्ड लॉन्च होते ही इस गीत का प्रसारण बी बी सी लंदन से हुआ और हमारी छत्तीसगढ़ी भाषा सात समुन्दर पार से सम्पूर्ण विश्व में गूँज उठी। तब से आज तक यही गीत कविता वासनिक का मास्टर गीत बना हुआ है। साइड B के दूसरे गीत “हम तोरे सँगवारी कबीरा हो” को गायक भैया लाल हेड़ाऊ ने स्वर दिया था। यह गीत आज भी भैयालाल हेड़ाऊ का मास्टर गीत बना हुआ है।
इस प्रथम रिकॉर्ड के तीनों ही गीतों के गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया हैं। संगीतकार हैं खुमान-गिरिजा अर्थात खुमानलाल साव और गिरिजा कुमार सिन्हा। निर्माता कम्पनी है “म्यूज़िक इंडिया लि.। कंपनी द्वारा जारी ई पी रिकॉर्ड का नम्बर है 2222830. इंट्रोड्यूसर – ताज अली थारानी और प्रोड्यूसर – संगीतम, गाँधी चौक दुर्ग। इस प्रथम ई पी रिकॉर्ड का नाम दिया गया – “लक्ष्मण मस्तुरिया के छत्तीसगढ़ी गीत”। यह रिकॉर्ड स्टीरियो साउण्ड में था। रविकान्त वर्मा ने इस रिकॉर्ड का कव्हर पेज बनाया था।
छत्तीसगढ़ की आत्मा को चीह्नना है तो मस्तूरिया को जरूर सुने

लक्ष्मण मस्तुरिया
किसी को छत्तीसगढ़ की आत्मा को चीह्नना है तो वह लक्ष्मण मस्तूरिया जी को जरूर सुने। मस्तुरिया लोक गायक, गीतकार और संगीतकार हैं। इनकी बोली, धुन और गायकी में जो बात है, उसे सुनकर जी जुड़ा जाता है। छत्तीसगढ़ी माटी की गंध, उदारता, प्रेम, समर्पण, भावुकता, कोमलता और हरियाली के साथ एक आवाहन भी इनके गीतों में मिलता है।
इनकी एक महान रचना है, ‘मोर संग चलव रे…!’
मैंने सदैव कवि को अपने शब्दों से लोगों को प्रेरित करते देखा है पर इस गीत में कवि स्वयं आगे खड़ा होकर कह रहा… मोर संग चलव रे….! यह अद्भुत है। कुछ अन्य गीतों में देखें… चिटिक अंजोरी निर्मल छइहाँ…, पता दे जा रे गाड़ीवाला…, मंगनी मा मांगे मया नई मिले रे मंगनी मा…, जय हो जय सरसती माई…, अरपा-पैरी के धार…, तोर खोपा मा फुंदरा रइहौं बन के… और बखरी के तुमा नार बरोबर मन झुमरे… सुनकर तन-मन सब हरियर हो जाता है। बिचित्र बात यह है कि इस माटीपुत्र को जो छत्तीसगढ़ी राज बने से पहिली से ही छत्तीसगढ़ी अस्मिता को अपने गीतों में बार के रखा था, वह मान नहीं मिला जिसके वे हक़दार थे। बहरहाल, लोकगायक दिलों में राज करते हैं। लोग उन्हें सम्मान से नहीं, मया (प्रेम) से जानते हैं।
फोटो साभार-अरूण कुमार निगम व प्रमोद यादव











